रेणु मिश्रा का कहानी-संग्रह "किसी अजनबी के प्यार में" उन कहानियों का संग्रह है जो पढ़ते समय जितनी सहज लगती हैं, समाप्त होने के बाद उतनी ही देर तक मन में गूँजती रहती हैं। इन कहानियों के पात्र बहुत देर तक मन की परतों को कुदेरते रहते हैं। संग्रह की पहली ही कहानी किसी को खोने से लेकर किसी को पाने तक का पूरा सफ़र तय करा देती है। किताब की हर कहानी का अपना अलग रंग और अपना अलग दृष्टिकोण है जो लेखक अपने पाठकों को देना चाहता है। कहीं पहली मोहब्बत की मासूमियत है, कहीं बिछड़ने की चुभन, जिन्हें शब्दों से अधिक एहसासों में समझा जा सकता है। रेणु ने प्रेम को किसी एक परिभाषा में नहीं बांधा, बल्कि उसके अनेक रूपों को बड़ी सहजता से सामने लाई हैं।
कहानी "बालकनी में भगवान" तो मानो अब शहर-शहर की बात हो गई है। बुलेट ट्रेन की तरह भाग रहे युग में लोगों की प्राथमिकता बदलती जा रही हैं मगर मालती देवी जैसी कई औरतें आज भी अपने बेटू-बहू का इंतजार हर त्यौहार पर कर रहीं हैं। "दो दूनी पाँच" स्त्री के संघर्ष, आत्मसम्मान और आत्म-खोज को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। हर कहानी अपने-अपने विषय और भावनात्मक प्रभाव के कारण विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं। रेणु मिश्रा की लेखन-शैली इस पुस्तक की सबसे बड़ी ताक़त है। उनकी भाषा सरल है और उन्होंने ये सिद्ध किया कि सरल भाषा में भी असाधारण बात कही जा सकती है। वे बिना किसी लाम- लपेट या भारी-भरकम शब्दों का सहारा लिए बिना कहती हैं जो पाठक के भीतर गहरी जगह बना लेते हैं।
इस कहानी संग्रह में स्त्री को पुराने जमाने की अबला नहीं दिखाया गया, बल्कि इन कहानियों में स्त्री संघर्ष करती हुई, टूटती-बिखरती और फिर से खड़ी होती है। लेखक ने स्त्री-विमर्श पर भाषण नहीं दिया बल्कि पात्रों के जीवन के माध्यम से उसे स्वाभाविक रूप से सामने लाई हैं। यही कारण है कि कहानियाँ उपदेश नहीं देतीं, बल्कि पाठक को स्वयं सोचने का अवसर देती हैं। "किसी अजनबी के प्यार में" केवल प्रेम, बिछड़न, कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि उन अनकहे एहसासों का बंडल है जिन्हें हम अक्सर अपने भीतर दबाकर जीते रहते हैं। यह पुस्तक याद दिलाती है कि कुछ अजनबी लोग हमारी ज़िंदगी में थोड़ी देर के लिए आते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी हमारे भीतर हमेशा के लिए रह जाती है। बहरहाल, यदि आपको ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जो शोर नहीं करतीं, बल्कि धीरे-धीरे आपके भीतर उतरकर आपको अपने ही जीवन के किसी भूले हुए हिस्से से मिलवा दें, तो "किसी अजनबी के प्यार में" निश्चित रूप से पढ़ी जानी चाहिए।


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