प्रेम, प्रतीक्षा और आत्मखोज की अनूठी कथा है ‘ब्रह्म-पत्र’ | किताबें & सिनेमा

 

प्रेम पर लिखी गई अधिकांश कहानियाँ अपने पाठकों को किसी सुखद मिलन, बिछड़न या किसी और अंजाम तक ले जाती हैं, लेकिन शिव शंकर झा का उपन्यास ‘ब्रह्म-पत्र’ प्रेम को किसी एक घटना या रिश्ते की सीमा में बाँधने के बजाय उसे मनुष्य के भीतर चलने वाली एक लंबी यात्रा के रूप में देखता है। इस यात्रा का फलसफा अनेक युगों का इंतजार है और इसके साथ ही कुछ अनकहे प्रश्न जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।

धार्मिक और मीनाक्षी की कहानी असम के एक पुस्तकालय में हुई मुलाकात से आरंभ होती है। धीरे-धीरे पत्रों में बढ़ती उनकी नजदीकियां केवल आकर्षण की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि भावनाओं, परिस्थितियों और जीवन के निर्णयों के बीच उलझता हुआ एक शाश्वत अनुभव बन जाता है। पुस्तक के नाम अनुसार उपन्यास में पत्रों की विशेष भूमिका है। ये पत्र केवल दो व्यक्तियों के बीच संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि उन भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं जिन्हें सामने बैठकर कह पाना हमेशा संभव नहीं होता। प्रेम लिखा नहीं जाता, जिया जाता है जैसे कई संवाद सोचने पर मजबूर कर देते हैं।

लेखक शिव शंकर झा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे प्रेम को केवल पाने की इच्छा तक सीमित नहीं रखते। उनके प्रेम में धैर्य है, समर्पण है और अपने भीतर झाँकने की क्षमता भी। प्रतीक्षा के साथ-साथ किसी को पा लेने और प्रेम में किसी को आजाद करने का साहस है। कहानी पढ़ते हुए यह विचार बार-बार उभरता है कि किसी व्यक्ति से जुड़ाव कभी-कभी उसके साथ रहने से अधिक, उसकी स्मृतियों और अपने भीतर उसके लिए बनाए गए स्थान में जीवित रहता है। शिव शंकर झा की भाषा सहज, भावपूर्ण और काव्यात्मक है। वे दार्शनिक विचारों को कहानी का बोझ नहीं बनने देते, बल्कि उन्हें पात्रों की अनुभूतियों के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़ते हैं। कुछ प्रसंगों में कथा की गति धीमी पड़ती नजर आती है लेकिन यही ठहराव उपन्यास के भावलोक को समझने का अवसर भी देता है जिसे हाइलाइटर से हाइलाइट करने का मन करता है।


‘ब्रह्म-पत्र’ की खूबी इसके सवालों में है जो कदम-कदम पर लेखक अपने पाठकों से पूछता है। क्या प्रेम को पूर्ण होने के लिए मिलन आवश्यक है? क्या इंतजार भी प्रेम की एक अभिव्यक्ति हो सकती है? क्या अब के बिछड़े लोग किसी ना किसी युग में मिलते हैं ? बहरहाल, यह उपन्यास इन प्रश्नों के सटीक जवाब नहीं देता, बल्कि पाठक को अपनी अनुभूतियों के आधार पर उन्हें समझने की स्वतंत्रता देता है। जो पठक प्रेम, विरह और आत्मचिंतन को एक साथ अनुभव करना चाहते हैं उनके लिए ‘ब्रह्म-पत्र’ एक संवेदनशील और लम्बे समय तक जहन में हलचल करने वाला उपन्यास है।


कैसे अजनबी बन जाते हैं अपने के एहसास से रूबरू कराती ‘किसी अजनबी के प्यार में’ | किताबें & सिनेमा

 


रेणु मिश्रा का कहानी-संग्रह "किसी अजनबी के प्यार में" उन कहानियों का संग्रह है जो पढ़ते समय जितनी सहज लगती हैं, समाप्त होने के बाद उतनी ही देर तक मन में गूँजती रहती हैं। इन कहानियों के पात्र बहुत देर तक मन की परतों को कुदेरते रहते हैं। संग्रह की पहली ही कहानी किसी को खोने से लेकर किसी को पाने तक का पूरा सफ़र तय करा देती है। किताब की हर कहानी का अपना अलग रंग और अपना अलग दृष्टिकोण है जो लेखक अपने पाठकों को देना चाहता है। कहीं पहली मोहब्बत की मासूमियत है, कहीं बिछड़ने की चुभन, जिन्हें शब्दों से अधिक एहसासों में समझा जा सकता है। रेणु ने प्रेम को किसी एक परिभाषा में नहीं बांधा, बल्कि उसके अनेक रूपों को बड़ी सहजता से सामने लाई हैं।

कहानी "बालकनी में भगवान" तो मानो अब शहर-शहर की बात हो गई है। बुलेट ट्रेन की तरह भाग रहे युग में लोगों की प्राथमिकता बदलती जा रही हैं मगर मालती देवी जैसी कई औरतें आज भी अपने बेटू-बहू का इंतजार हर त्यौहार पर कर रहीं हैं। "दो दूनी पाँच" स्त्री के संघर्ष, आत्मसम्मान और आत्म-खोज को बेहद संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। हर कहानी अपने-अपने विषय और भावनात्मक प्रभाव के कारण विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं। रेणु मिश्रा की लेखन-शैली इस पुस्तक की सबसे बड़ी ताक़त है। उनकी भाषा सरल है और उन्होंने ये सिद्ध किया कि सरल भाषा में भी असाधारण बात कही जा सकती है। वे बिना किसी लाम- लपेट या भारी-भरकम शब्दों का सहारा लिए बिना कहती हैं जो पाठक के भीतर गहरी जगह बना लेते हैं। 


इस कहानी संग्रह में स्त्री को पुराने जमाने की अबला नहीं दिखाया गया, बल्कि इन कहानियों में स्त्री संघर्ष करती हुई, टूटती-बिखरती और फिर से खड़ी होती है। लेखक ने स्त्री-विमर्श पर  भाषण नहीं दिया बल्कि पात्रों के जीवन के माध्यम से उसे स्वाभाविक रूप से सामने लाई हैं। यही कारण है कि कहानियाँ उपदेश नहीं देतीं, बल्कि पाठक को स्वयं सोचने का अवसर देती हैं। "किसी अजनबी के प्यार में" केवल प्रेम, बिछड़न, कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि उन अनकहे एहसासों का बंडल है जिन्हें हम अक्सर अपने भीतर दबाकर जीते रहते हैं। यह पुस्तक याद दिलाती है कि कुछ अजनबी लोग हमारी ज़िंदगी में थोड़ी देर के लिए आते हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी हमारे भीतर हमेशा के लिए रह जाती है। बहरहाल, यदि आपको ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जो शोर नहीं करतीं, बल्कि धीरे-धीरे आपके भीतर उतरकर आपको अपने ही जीवन के किसी भूले हुए हिस्से से मिलवा दें, तो "किसी अजनबी के प्यार में" निश्चित रूप से पढ़ी जानी चाहिए।





मोहब्बत, बग़ावत और तन्हाई का फ़लसफ़ा : जौन एलिया एक अजब-ग़ज़ब शायर | किताबें & सिनेमा

 

कुछ शायर ऐसे होते हैं जिन्हें पढ़ना महज़ पढ़ना नहीं होता, बल्कि उनकी बेचैनी, तन्हाई और सवालों से होकर गुजरना होता है। जौन एलिया उन्हीं शायरों में से एक हैं जो खुद को पागल कहते थे और जिन्हें सुनने और पढ़ने के लिए दुनिया को पागल होना ही पड़ेगा। उनकी शायरी में एक अजीब-सी दीवानगी दौड़ी चली आती है और पाठक उस दीवानगी के दरिया में गोते लगाने लगता है।

मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी की इस किताब में जौन साहब के जटिल और दिलचस्प व्यक्तित्व को करीब से समझने का अवसर देती है। यह महज़ एक जीवनी नहीं, बल्कि उस इंसान और शायर की तलाश है जिसके भीतर मोहब्बत, बग़ावत, फ़लसफ़ा, तन्हाई और बेचैनी एक साथ मौजूद थे। यह किताब उस शायर के जीवन दर्शन को खोलकर रखती है जिसने खुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं। जौन एलिया को अक्सर सिर्फ़ दर्द और मोहब्बत के शायर के रूप में याद किया जाता है, लेकिन किताब उनके व्यक्तित्व के उन पहलुओं को भी सामने लाती है जो उनकी शायरी को समझने के लिए बेहद ज़रूरी हैं। उनकी बाग़ी सोच, समाज को देखने का अलग नज़रिया और रिश्तों को लेकर उनकी जटिल संवेदनाएँ उन्हें उम्दा शायर होने का प्रमाण देती है।

इस किताब की खूबसूरती यह है कि जौन को किसी आदर्श या महान व्यक्तित्व के साँचे में ढालने की कोशिश नहीं की गई है। उनके भीतर मौजूद कमज़ोरियों, कड़वाहट, बेचैनी और अकेलेपन को भी उसी सहजता से सामने रखा गया है। यही ईमानदारी जौन को पाठक के और करीब ले आती है। उन्हें पढ़ते हुए लगता है कि उनकी तल्ख़ी के पीछे एक बेहद संवेदनशील और तन्हा इंसान मौजूद था। जौन का दर्द सिर्फ़ अधूरी मोहब्बत का दर्द नहीं था। उसमें ज़िंदगी से असंतोष, समाज से टकराव, रिश्तों की उलझन और अपने समय से पैदा हुई निराशा भी शामिल थी। 


मुंतज़िर फ़िरोज़ाबादी ने जौन एलिया की जिंदगी और उनकी ग़ज़लों को जिस तरह साथ रखकर प्रस्तुत किया है, उससे पाठक शायर के शब्दों के पीछे छिपे इंसान को देखने लगता है। भाषा सहज है और प्रस्तुति ऐसी कि किताब पढ़ते हुए कई जगह ऐसा अहसास होता है जैसे किसी पुरानी शाम में बैठकर जौन साहब की जिंदगी, मोहब्बत और दर्द की दास्तान सुन रहे हों। जौन ने किताबों को खरीदना और उन्हें पढ़ने को लेकर बहुत अच्छा कहा है जो इस किताब में दर्ज है। अगर आप जौन एलिया की शायरी के मुरीद हैं, उर्दू से मोहब्बत करते हैं, जिनकी शायरियां आपने इंस्टग्राम पर कई दफा स्क्रोल की हैं, जिनकी रचनाएँ उनके जीवन की बेचैनियों से जन्म लेती हैं, तो यह किताब आपके लिए एक खूबसूरत सफ़र हो सकती है। और आखिर में उन्हीं की शायरी के साथ कि 'जो गुज़ारी ना जा सकी हमसे, हमने वो ज़िंदगी गुज़ारी है...



रिश्तों की जकड़न से खुद को खोने से बचाने की कहानी है : बेहया | किताबें & सिनेमा

 


विनीता अस्थाना का उपन्यास ‘बेहया’ स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को लेकर समाज से कई पेचीदा और जरूरी सवाल करता है। एक स्त्री की निजी जिंदगी और रिश्तों में टकराव जिसे सिर्फ वो स्त्री जानती है, उसका सरल भाषा में सटीक वर्णन किया गया है। यह केवल घरेलू हिंसा या दांपत्य संबंधों की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष की आपबीती है जिसमें एक महिला अपने अस्तित्व और सम्मान को बचाने के लिए खुद से भी सवाल करती है। 

उपन्यास की मुख्य पात्र सिया एक सफल, आत्मनिर्भर और संवेदनशील महिला है। अपने प्रोफेशनल जीवन में वह आज की नारी की तरह आत्मविश्वास से भरी है, लेकिन निजी जीवन में परिस्थितियाँ उसके बिल्कुल उलट हैं। उसका पति यश आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद अपनी निम्न मानसिकता और असुरक्षा से बाहर नहीं निकल पाता। सिया की सफलता और स्वतंत्र व्यक्तित्व उसके लिए सहज नहीं हैं। इसी बीच अभिज्ञान सिया के जीवन में आता है। उसका किरदार केवल प्रेम के एक नए विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि सिया को अपने भीतर झांकने और अपने फैसलों पर विचार करने का अवसर देने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आता है। सिया उससे मिलकर समझने लगती है कि सेल्फ रिस्पेक्ट  कुचलकर जिंदगी जीना जिंदगी नहीं है। यहाँ शुरू होती है एक प्लोटोनिक प्रेम कहानी जो अपने आप में अलग और बेहतरीन है।

विनीता ने पूरी कहानी में बौद्धिक ज्ञान देने की बजाय कहानी को उनके पात्रों के जरिए पाठकों को सोचने के लिए मजबूर किया। एक खासियत यह भी है कि विनीता कहानी को एकतरफा नहीं बनातीं। स्त्री के साथ होने वाले मानसिक शोषण और सामाजिक दबाव के साथ पुरुष के भीतर मौजूद असुरक्षा और भावनात्मक संघर्ष को भी समझने की कोशिश की गई है। इस तरह कहानी के सभी पात्र अपनी कमजोरियों और परिस्थितियों के साथ सामने आते हैं। 

‘बेहया’ शीर्षक भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण सवाल है। समाज अक्सर अपने लिए फैसले लेने वाली और स्वतंत्र स्त्री को ना जाने कैसे-कैसे नामों से पुकारता है। उसमें एक विशेषण बेहया भी है। विनीता अस्थाना की भाषा सहज और प्रवाहपूर्ण है। जब यह किताब पढ़ना शुरू करते हैं तो बस पढ़ते ही जाते हैं। यह उपन्यास बार-बार ये सवाल करता है कि रिश्ते बचाने की कोशिश में इंसान खुद को कितना खो सकता है और किस मोड़ पर अपने लिए खड़ा होना जरूरी हो जाता है। लेकिन सही समय पर खराब रिश्ते से बाहर निकल जाना और अकेले हो जाना बेहतर ही होता है।‘बेहया’ आत्मसम्मान, रिश्तों, सामाजिक सोच और स्त्री की स्वतंत्र पहचान की जद्दोजहद में खुद को खोजता हुआ एक संवेदनशील उपन्यास है।  इसकी कहानी खत्म होने के बाद भी कुछ जरूरी सवाल अपने साथ ले जाने के लिए मजबूर करती है।



रिश्तों की अनकही परतों को टटोलती कहानियाँ : अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार | किताबें & सिनेमा

 

विजयश्री तनवीर का कहानी-संग्रह ‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ रिश्तों के उन हिस्सों को गहराई से सामने लाता है, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल पाते। इन कहानियों में प्रेम है लेकिन केवल प्रेमी-प्रेमिका वाले अर्थ में नहीं, यहाँ प्रेम के साथ अकेलापन, प्रतीक्षा, स्मृतियाँ, असुरक्षाएँ, दूरी और अधूरे रिश्तों की कसक भी है। विजयश्री रिश्तों को किसी निश्चित परिभाषा में बाँधने के बजाय उनकी जटिलता और मानवीय कमजोरियों के साथ प्रस्तुत करती हैं। 

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ विशेष रूप से ध्यान खींचती है। अनुपमा का चरित्र कई भावनात्मक परतों से गुजरता है। उसके अनुभव केवल उसके व्यक्तिगत जीवन की कहानी नहीं रह जाते, बल्कि पाठक को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि मनुष्य की इच्छाओं और भावनाओं को सामाजिक मानकों के आधार पर कितना आसानी से समझा जा सकता है। ‘समंदर से लौटती नदी’ कहानी में संवेदनाओं का विकास बेहद सहज ढंग से होता है। वहीं ‘एक उदास शाम के अंत में’ और ‘खजुराहो’ जैसी कहानियाँ पात्रों के बाहरी जीवन से अधिक उनके भीतर चल रहे युध्द को सामने रखती हैं। 

विजयश्री तनवीर की भाषा इस संग्रह की महत्वपूर्ण विशेषता है। उनकी शैली में काव्यात्मक स्पर्श है, लेकिन बनावटी कतई नहीं लगती। वे घटनाओं का केवल वर्णन नहीं करतीं, बल्कि उनके पीछे छिपे भाव को भी पाठक तक पहुँचाती हैं। कई प्रसंग इसलिए प्रभावी बन जाते हैं क्योंकि वे हमारे आसपास के जीवन जैसे लगते हैं। इन कहानियों के किरदार अपने हिस्से का पूर्ण समर्पण कहानी को सौंप देते हैं। वे कोई नायक की तरह नहीं बल्कि गलतियों, कमजोरियों और उलझनों के साथ सामने आते हैं। यही अपूर्णता उन्हें विश्वसनीय बनाती है। 

‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ उन पाठकों को अधिक आकर्षित कर सकता है जो कहानी के भीतर मौजूद मनोभावों को पढ़ना पसंद करते हैं। यह किताब शोर नहीं करती; धीरे-धीरे अपनी जगह बनाती है। किताब की एक-एक कहानी आप पढ़ने के बाद थोड़ा ठहर जाते हैं। यह कहानी संग्रह प्रेम और रिश्तों को एक ही नजरिए से देखने के बजाय उनके कई रंगों और अनकही परतों को सामने रखता है, जो किताब को अन्य किताबों से अलग और यूनिक बनाता है।



प्रेम, दोस्ती और मानवीय संवेदनाओं को समेटे पाँच अफ़साने : बनारसी अफ़साने | किताबें & सिनेमा

 

प्रियंवदा दीक्षित की बनारसी अफ़साने किताब अपने पाँच अफ़सानों को गाइड बना पाठकों को बनारस की गलियों, घाटों, चाय की दुकानों, और वहाँ के लोगों की भावनाओं से जोड़ देती है। यह केवल कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि बनारस के घाटों के वो अनगिनत किस्से हैं जो बनारस के यथार्थ को बताते हैं। प्रियंवदा की भाषा इतनी सहज, आत्मीय और प्रभावशाली है कि हर दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो उठता है। फिर हर कहानी के अंत में दिया बेजोड़ ज्ञान उस कहानी के सार को बड़ी सुंदरता से कह देता है।

संग्रह की पहली कहानी "अस्सी घाट" दोस्ती, प्रेम और बिछड़ने के दर्द को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है। किसी अपने के चले जाने के बाद जीवन बदल तो जाता है, लेकिन सच्चे दोस्त हमें फिर से जीना सिखाते हैं। दूसरी कहानी "नई सड़क" सांप्रदायिक दंगों की भयावहता और राजनीति के कारण सबसे अधिक पीड़ित होने वाले आम और मासूम लोगों की व्यथा को सामने लाती है। "मणिकर्णिका" कहानी थर्ड जेंडर समुदाय के संघर्ष, सामाजिक उपेक्षा और उनके भीतर छिपे दर्द को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। चौथी कहानी "वी.टी. रोड" अधूरे प्रेम की कसक और जीवन में आगे बढ़ने की आवश्यकता को बड़ी खूबसूरती से व्यक्त करती है। फिर आखिरी कहानी "तुलसी घाट" सच्चे प्रेम और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने के साहस की कहानी है। यह संदेश देती है कि प्रेम तभी पूर्ण होता है जब उसमें विश्वास और साथ निभाने का साहस हो। किताब में बनारस के अफ़साने वहाँ की आध्यात्मिक छाप लिए हुए हैं। वहाँ की आत्मीय संस्कृति हर कहानी में साँस लेती हुई महसूस होती है। 

बहरहाल, प्रियंवदा की भाषा सरल, सहज और बिना किसी बनावटीपन के होने से सीधे दिल तक पहुँचती है। हर कहानी अपने भीतर एक अलग संसार समेटे हुए है। कहीं दोस्ती है, कहीं अधूरा प्रेम, कहीं सामाजिक संवेदनाएँ और कहीं जीवन को नए नज़रिए से देखने की प्रेरणा। यदि आप ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जो आपके दिल को छू जाएँ और बनारस को एक नए नजरिया से देखने के लिए मजबूर कर दे तो बनारसी अफ़साने अवश्य पढ़िए।




सपनों की लंबी उड़ान भरने के बाद अपनी जड़ों की ओर वापिस लौटने की कहानी है : मैं अब भी वहीं हूँ |किताबें&सिनेमा

हमारी जिंदगी में कुछ ऐसे पड़ाव आते हैं, जिन्हें पीछे छोड़कर हम आगे तो निकल जाते हैं लेकिन उनसे पूरी तरह अलग नहीं हो पाते। अपना गाँव, घर का आँगन, दोस्तों के साथ बिताया वक्त, किसी अपने की कही हुई बातें या अधूरा रह गया कोई सपना ये सब समय के साथ हमारी यादों का हिस्सा बन जाते हैं। पंकज जीना का उपन्यास ‘मैं अब भी वहीं हूँ’ इन्हीं यादों और उनसे जुड़े भावनात्मक जुड़ाव को शब्द देता है।

कहानी पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक उस पीढ़ी की कहानी कह रहे हैं जिसने छोटे शहरों और अपने परिचित माहौल से निकलकर बड़े शहरों में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश की है। सपनों को पूरा करने की चाह में घर से दूर जाना, नई जगह पर खुद को स्थापित करना, नए दोस्त बनाना और इस पूरे सफर में अपने पुराने जीवन को भीतर संजोए रखना बहुत मुश्किल है।
पंकज जीना की लेखन शैली सहज है। भाषा कहीं भी पाठक पर अपनी साहित्यिक गंभीरता थोपने की कोशिश नहीं करती। घटनाएँ सामान्य जीवन से उठाई हुई लगती हैं और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है जिससे लोग खुद को कहानी से कनेक्ट कर लेते हैं।

उपन्यास में कॉरपोरेट जगत की झलक भी देखने को मिलती है। नौकरी की भागदौड़, काम का तनाव, बॉस का दबाव, अकेले कमरे में गुजारते दिन और परिवार से अपनी परेशानियां छिपाकर उन्हें आश्वस्त करते रहना कि सब अच्छा चल रहा है, ऐसे कई अनुभवों को लेखक ने जिस तरह कहानी का हिस्सा बनाया है, वह आज के युवा जीवन की सच्चाई को सामने रखता है। रेडियो की दुनिया का चित्रण किताब को एक अलग आयाम देता है और पाठक को उस संसार के करीब ले जाता है।

कहानी में प्रेम भी मौजूद है लेकिन यहाँ प्रेम के साथ इंतजार है, दूरी है, अधूरेपन की कसक है और रिश्तों को बचाए रखने की कोशिश भी है। परिवार और दोस्ती के प्रसंग कहानी को भावुक बना देते हैं। पुरानी जगहों और बीते हुए समय की यादें आपको अपने दौर की याद दिला देती हैं। इस किताब की एक खास बात यह है कि इंसान परिस्थितियों के साथ बदलता जरूर है, लेकिन उसकी जड़ें अक्सर उसी जगह बनी रहती हैं जहाँ उसने पहली बार सपने देखे थे। मुखर का वापिस अपनी जड़ों में वापिस लौटना बताता है कि सपनों के साथ-साथ अपने भी बहुत जरूरी हैं। 

‘मैं अब भी वहीं हूँ’ आत्मकथात्मक अपने ज़मीनी जुड़ाव के कारण और भी विश्वसनीय है। कई इंसीडेंट इतने स्वाभाविक लगते हैं कि पाठक को लगता है जैसे वह किसी लेखक की कहानी नहीं, बल्कि खुद अपनी जिंदगी के पन्ने पढ़ रहा हो। अगर आप ऐसी कहानी में खोना चाहते हैं जिसमें काल्पनिक दुनिया ना दिखाकर जिंदगी के छोटे अनुभव, रिश्तों की गर्माहट, बनारस, बीते समय की कसक और अपनेपन का एहसास महत्वपूर्ण हो, तो यह उपन्यास आपको पसंद आयेगा। किताब खत्म होने के बाद आप सोचेंगे कि शायद हम सभी के भीतर सचमुच कोई न कोई हिस्सा आज भी वहीं है, जहाँ से हमारी कहानी शुरू हुई थी।

किताब : मैं अब भी वहीं हूँ
लेखक : पंकज जीना
प्रकाशक : ख्याति प्रकाशन


एक इन्सानी त्रासदी की कहानी जो खत्म होने के बाद भी भीतर चलती रहती है : चींटी की अर्थी | किताबें & सिनेमा

कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो किताब के आखिरी पन्ने के साथ समाप्त तो हो जाती हैं लेकिन पाठक के मन में वे बहुत देर तक भीतर कहीं चलती रहती हैं। कौशलेन्द्र यादव का उपन्यास ‘चींटी की अर्थी’ इसी तरह की रचना है, जो प्रेम की कहानी कहते-कहते समाज की गहरी और कड़वी सच्चाइयों से रूबरू कराता है। यह कहानी इंसानी त्रासदी की है जिसका अंत हिंदी फिल्मों की तरह सुखद नहीं होता।

कहानी इलाहाबाद की ज़मीन पर पनपती है।विनोद, प्रिया, शाहिद और अन्य पात्रों के माध्यम से लेखक ने ऐसी दुनिया बनाई है, जहाँ रिश्ते केवल दो लोगों के बीच नहीं रहते, बल्कि परिवार, प्रतिष्ठा, सामाजिक सोच और लोगों की धारणाएँ भी उनके फैसलों को ज़मीदोज़ कर देती हैं। यही वजह है कि कहानी के साथ आगे बढ़ते हुए हम कभी विनोद के पक्ष तो कभी प्रिया की उलझनों को महसूस करते हैं। और कभी शाहिद के प्रति सहज सहानुभूति पैदा होती है।

इस उपन्यास को केवल प्रेम-कथा कहना इसके साथ न्याय नहीं होगा। कहानी में प्रेम जरूर है, लेकिन उसके पीछे सामाजिक रूढ़ियाँ, अफवाहें, पारिवारिक प्रतिष्ठा और ऑनर किलिंग जैसी क्रूर मानसिकता का बड़ा सवाल मौजूद है। लेखक यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि जब किसी अफवाह को सच मान लिया जाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा इंसानी जिंदगी से बड़ी समझी जाने लगती है, तब पैदा होने वाली त्रासदी भयावह होती है जिसका जिम्मेदार कोई नहीं होता। आज के समय में समाज द्वारा फैलाई गई अफवाहें किसी की जिंदगी बर्बाद करने के लिए काफी हैं।

उपन्यास की खूबी यह है कि लेखक इन सवालों के जवाब देने के बजाय पाठक को स्वयं सोचने की जगह देता है। कहानी का सस्पेंस और घटनाओं का क्रम पाठक की दिलचस्पी बनाए रखता है। कहानी मानो वेब सीरीज के पार्ट्स जैसी आगे बढ़ती है और आगे क्या होने वाला है ये जानने की उत्सुकता बनी रहती है। 

‘चींटी की अर्थी’ का सबसे प्रभावशाली पक्ष इसका सामाजिक सरोकार है। लेखक ने कहानी के साथ जो अपने विचार रखे हैं वे आम इंसान को झकझोर देते हैं। प्रेम, प्रतिष्ठा और सामाजिक दबाव के बीच पिसते इंसान की कहानी के माध्यम से यह रचना हमें अपने आसपास के समाज को नए नजरिए से देखने का अवसर देती है। दुख की पराकाष्ठा का जो मंजर लेखक ने पेश किया है वो निशब्द कर देने वाला है, इतना संवदेनशील कि आँखों में आंसू आ जाए। किताब के पात्र और उनके संघर्ष स्मृति में रह जाते हैं और कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब किताब बंद करने के बाद भी पाठक अपने भीतर खोजता रहता है। अरे विनोद का क्या हुआ...।

कौशलेन्द्र यादव के इस संवेदनशील उपन्यास की कहानी ना जाने कितने लोगों की कहानी है। अगर आप ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जिसमें प्रेम के साथ सामाजिक संघर्ष हो, भावनात्मक गहराई हो और कहानी खत्म होने के बाद भी कुछ सवाल आपके साथ बने रहें तो ‘चींटी की अर्थी’ आपके लिए ही बनी है।

किताब : चींटी की अर्थी
लेखक : कौशलेन्द्र 
प्रकाशक : पंक्ति प्रकाशन






प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा

कैलाश मांजू बिश्नोई की कलेक्टर साहिबा सीरीज की दोनों किताबें सिविल सेवा की तैयारी, प्रेम, महत्वाकांक्षा, संघर्ष और जीवन के कठिन निर्णयों को एक साथ पिरोने का प्रयास करती है। व्यक्ति की परिस्थिति बदलते ही प्रेम का यूं हुआ अंत आपको झकझोर देता है। कहानी का केंद्र गिरीश और एंजेल दोनों के सपने बड़े हैं और मंजिल भी लगभग एक ही—सिविल सर्विसेज। लेकिन जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता। एंजेल अपने लक्ष्य को हासिल कर IAS अधिकारी बन जाती है, जबकि गिरीश का सफर कहीं अधिक संघर्षपूर्ण हो जाता है। बस यहीं से कहानी केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की कहानी न रहकर प्रेम, महत्वाकांक्षा और परिस्थितियों के बीच फँसे दो व्यक्तियों की कहानी बन जाती है।

पहले भाग में लेखक ने सिविल सेवा की तैयारी की दुनिया को करीब से दिखाने का प्रयास किया है। तैयारी के दौरान आने वाली मुश्किलें और अभ्यर्थियों के मन में चलने वाली उथल-पुथल जैसे प्रसंग पुस्तक को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से जोड़ते हैं। बीच-बीच में दिए गए सुझाव और प्रेरणात्मक विचार भी उपयोगी हैं। पहले भाग में आपको कहानी कम मोटिवेशन का डोज ज्यादा मिलता है। जिससे लेखक की कोशिश यही है कि वह केवल कहानी सुनाना नहीं चाहते, बल्कि अपने पाठकों, खासकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे युवाओं को सकारात्मक संदेश भी देना चाहते हैं।

दूसरे भाग में कहानी बहुत इमोशनल हो जाती है। गिरीश और एंजेल के रिश्ते में आए बदलाव, दूरी, प्रेम, पीड़ा और अधूरेपन को लेखक ने बयाँ किया है। गिरीश के पत्र और उसके मन की भावनाओं का चित्रण इस भाग के संवेदनशील हिस्सों में शामिल है। एंजेल एक ओर उसका करियर और उसकी एंबीशन हैं, दूसरी ओर परिवार, सामाजिक परिस्थितियाँ और निजी रिश्ते। दोनों पुस्तकों में प्रेम के साथ-साथ आत्मसम्मान का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। गिरीश के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपने दर्द को केवल कमजोरी नहीं बनने देता। परिस्थितियाँ उसे तोड़ती हैं, लेकिन वही परिस्थितियाँ उसे अपने जीवन को नए तरीके से देखने की ताकत भी देती हैं। प्रेम में असफलता को अंत मानने के बजाय आत्मनिर्माण में बदलने का यह संदेश पुस्तक का सकारात्मक पक्ष है।

लेखक की भाषा सहज और संवादात्मक है। कई स्थानों पर संवाद, पत्र और भावनात्मक प्रसंग पाठक को कहानी से जोड़ते हैं। शायद इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात इसका अधूरापन है। हर प्रेम कहानी का सुखद अंत हो, यह जरूरी नहीं। कुछ रिश्ते मंजिल तक नहीं पहुँचते, लेकिन वे व्यक्ति को बदल जरूर देते हैं। गिरीश और एंजेल की कहानी भी इसी भाव को सामने लाती है। कभी-कभी किसी को पाना प्रेम नहीं होता, बल्कि उसके साथ बिताया समय, उससे मिली सीख और उसके बाद स्वयं को संभाल लेना भी प्रेम की एक अलग परिभाषा हो सकती है।

बहरहाल कलेक्टर साहिबा के दोनों भाग प्रेम, सपनों, संघर्ष, महत्वाकांक्षा और आत्मसम्मान की एक ऐसी यात्रा प्रस्तुत करते हैं जिसमें पाठक को जीवन में सही निर्णय लेने का जज़्बा पैदा होता है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से रुचिकर हो सकती है जिन्हें प्रेमकथाओं के साथ प्रेरणा और जीवन से जुड़े सबक भी समेटना पसंद हैं। यह सिर्फ कलेक्टर बनने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों के बीच जन्मे प्रेम, प्रेम में मिले दर्द और उस दर्द से खुद को फिर खड़ा करने की कहानी है।


पुस्तक: कलेक्टर साहिबा पार्ट 1-2
लेखक: कैलाश मांजू बिश्नोई
प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस

पुरुषों के अनकहे दर्द और ध्वस्त संवेदनाओं को छूकर जाता काव्य-संग्रह : एकांत में रोता पुरुष | किताबें & सिनेमा



कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष' भी ऐसी ही एक किताब है, जो शब्दों से अधिक भावनाओं से संवाद करती है। यह केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पुरुष के उन अनकहे अनुभवों और संवेदनाओं का ज्वालामुखी है जिन्हें समाज अक्सर यह कहकर अनदेखा कर देता है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" लेकिन जब ये ज्वालामुखी फटता है तो सिर्फ आँसुओं के कुछ नहीं निकलता।

लेखक प्रियेष  ने अपनी कविताओं के माध्यम से पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, जिम्मेदारियों, अकेलेपन और मौन को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए हैं। हमारा समाज पुरुषों से हमेशा चट्टान की तरह मज़बूत बने रहने की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पुरुष भी प्रेम करते हैं, उन्हें भी पीड़ा होती है, वे भी टूटते हैं और रोते भी हैं बस सबके सामने नहीं, बल्कि एकांत में।

किताब की सादगी और ईमानदारी ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक में मध्यवर्गीय जीवन की जिम्मेदारियाँ, बेरोज़गारी की पीड़ा, टूटते रिश्ते, प्रेम, पिता का संघर्ष, माँ का स्नेह, अकेलापन और जीवन की वास्तविकताओं को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। "पुरुष रोते हैं किन्तु एकांत में", "पुरुष का मौन", "पिता से आलिंगन" और "प्रेम में पड़ा पुरुष" जैसी कविताएँ पाठक को अंदर तक झकझोर देती हैं। लेखक की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो कोई अपना व्यक्ति सामने बैठकर अपने मन की बातें साझा कर रहा हो। 

व्यक्तिगत रूप से यह पुस्तक मुझे अत्यंत प्रभावित कर गई। अब तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक नहीं मिली थी जो पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक शोर को इतनी सहजता और गहराई से शब्द दे सके। मेरे विचार से एकांत में रोता पुरुष हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिससे वो किसी भी पुरुष के भीतर छिपी भावनाओं को थोड़ा और गहराई से समझ सकें। समाज में पुरुषों के संघर्ष, उनके मौन और उनके एकांत के दर्द को जिस संवेदनशीलता से शब्द दिए गए हैं, वह सराहनीय है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है।


पुस्तक: एकांत में रोता पुरुष

लेखक: प्रियेष मालवीय

प्रकाशक : हरसिंगार प्रकाशन



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