पुरुषों के अनकहे दर्द और ध्वस्त संवेदनाओं को छूकर जाता काव्य-संग्रह : एकांत में रोता पुरुष | किताबें & सिनेमा



कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष' भी ऐसी ही एक किताब है, जो शब्दों से अधिक भावनाओं से संवाद करती है। यह केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पुरुष के उन अनकहे अनुभवों और संवेदनाओं का ज्वालामुखी है जिन्हें समाज अक्सर यह कहकर अनदेखा कर देता है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" लेकिन जब ये ज्वालामुखी फटता है तो सिर्फ आँसुओं के कुछ नहीं निकलता।

लेखक प्रियेष  ने अपनी कविताओं के माध्यम से पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, जिम्मेदारियों, अकेलेपन और मौन को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए हैं। हमारा समाज पुरुषों से हमेशा चट्टान की तरह मज़बूत बने रहने की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पुरुष भी प्रेम करते हैं, उन्हें भी पीड़ा होती है, वे भी टूटते हैं और रोते भी हैं बस सबके सामने नहीं, बल्कि एकांत में।

किताब की सादगी और ईमानदारी ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक में मध्यवर्गीय जीवन की जिम्मेदारियाँ, बेरोज़गारी की पीड़ा, टूटते रिश्ते, प्रेम, पिता का संघर्ष, माँ का स्नेह, अकेलापन और जीवन की वास्तविकताओं को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। "पुरुष रोते हैं किन्तु एकांत में", "पुरुष का मौन", "पिता से आलिंगन" और "प्रेम में पड़ा पुरुष" जैसी कविताएँ पाठक को अंदर तक झकझोर देती हैं। लेखक की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो कोई अपना व्यक्ति सामने बैठकर अपने मन की बातें साझा कर रहा हो। 

व्यक्तिगत रूप से यह पुस्तक मुझे अत्यंत प्रभावित कर गई। अब तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक नहीं मिली थी जो पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक शोर को इतनी सहजता और गहराई से शब्द दे सके। मेरे विचार से एकांत में रोता पुरुष हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिससे वो किसी भी पुरुष के भीतर छिपी भावनाओं को थोड़ा और गहराई से समझ सकें। समाज में पुरुषों के संघर्ष, उनके मौन और उनके एकांत के दर्द को जिस संवेदनशीलता से शब्द दिए गए हैं, वह सराहनीय है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है।


पुस्तक: एकांत में रोता पुरुष

लेखक: प्रियेष मालवीय

प्रकाशक : हरसिंगार प्रकाशन



गाँव, कॉलेज और सपनों के बीच झूलती एक बेहतरीन कहानी : कभी गाँव कभी कॉलज ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा

 


कुछ किताबें केवल कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक पूरे जीवंत परिवेश को पाठकों के समक्ष रख देती हैं। अगम जैन का पहला उपन्यास "कभी गाँव, कभी कॉलेज" भी ऐसी ही रचना है, जो गाँव और कॉलेज के बीच पसरी उस दुनिया को जीवंत करती है जहाँ सपने हैं, संघर्ष हैं, प्रेम है, दोस्ती है, असफलताएँ हैं और उम्मीदें भी हैं। उपन्यास की बात करें तो कहानी एक ऐसे गाँव से शुरू होती है जहाँ नया कॉलेज खुला है। शिक्षा का मंदिर बनने के बजाय वह धीरे-धीरे व्यापार का केंद्र बनता दिखाई देता है। डीन साहब और चिलोंटाजी जैसे पात्र शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह केवल विवेक, विनय, सुलोचन, चैन सिंह, सुरभि, महिमा, सुनील, राकेश, और चेतक भैया जैसे युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सामाजिक ताने-बाने की कहानी है जहाँ शिक्षा, व्यवस्था और समाज एक-दूसरे से टकराते भी हैं और एक-दूसरे को साथ-साथ भी चलते हैं। कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे मानो लेखक किसी दूर खड़े दर्शक की तरह नहीं, बल्कि उन्हीं गलियों, उन्हीं खेतों और उसी कॉलेज के बरामदों का हिस्सा रहे हों।

लेखक ने व्यंग्य को अपना सबसे प्रभावी हथियार बनाया है। उपन्यास पढ़ते हुए किताब के कई प्रसंग पाठकों को खुलकर हँसाते हैं। जैसे "मास्साहब" की परिभाषा, "भैया" कहने पर सविनय आंदोलन, "मुँहबोली पत्नी" जैसे प्रसंग कहानी को क्लिष्ट नहीं होने देते और इसी का सहारा लेकर लेखक समाज की गंभीर विसंगतियों पर गहरी चोट भी करता है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जो पाठक को कहानी से भटकने नहीं देती। विवेक जैसे संघर्षशील युवा के जीवन में सुरभि जैसी समझदार और पढ़ाकू दोस्त उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरती है। उनकी मित्रता प्रेम से अधिक प्रेरणा बनकर उभरती है। जहाँ उपन्यास शुरू होते ही सोच रहे थे कि विवेक और महिमा इसके नायक हो सकते हैं लेकिन खत्म होते-होते ये कहानी सुरभि और विवेक में समा गई। वही बात कि अंत में वो दो लोग मिलते हैं जो एक दूसरे को ढूँढ भी नहीं रहे होते हैं।

दूसरी ओर विनय का साहित्य के प्रति प्रेम और अपना विद्यालय खोलने का सपना यह दर्शाता है कि हर युवा का लक्ष्य केवल प्रशासनिक सेवा नहीं होता। कोई लेखक बनना चाहता है, कोई शिक्षक, कोई गाँव का सरपंच। सुलोचन का प्रेम और उसका संघर्ष, चैन सिंह का आलस्य और हास्य, महिमा का कॉलेज जीवन, सुनील की आवारागर्दी, राकेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ये सभी पात्र कहानी में रंग भरते हैं। कहानी में शिक्षा के व्यवसायीकरण, ग्रामीण युवाओं की सीमित संभावनाओं, प्रतिभाशाली छात्रों की मजबूरियों, प्रशासनिक उदासीनता और समाज में फैले दिखावे पर भी तीखा प्रहार करता है। 

"कभी गाँव कभी कॉलेज" एक ऐसा उपन्यास है जो आपको हँसाता भी है, सोचने पर मजबूर भी करता है और अपने कॉलेज के दिनों तथा गाँव की सोंधी सी यादों में भी ले जाता है। यदि आप ऐसे उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं जिनमें हास्य, व्यंग्य, संवेदना, प्रेम, दोस्ती और ग्रामीण जीवन सब समा गए हों तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पढ़ने की सूची में शामिल होनी चाहिए।


किताब : कभी गाँव कभी कॉलेज 

लेखक: अगम जैन (IPS)

प्रकाशन: हिंद युग्म




दौड़ती-भागती सी ज़िंदगी में ठहरने जैसा सुकून देती 'मुसाफ़िर कैफे' | किताबें & सिनेमा



ई वाली हिंदी के लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की बेस्टसेलिंग किताब 'मुसाफ़िर कैफे' पर आधारित यह वेब सीरीज़ किताब की संवेदनाओं को ओटीटी के पर्दे पर खूबसूरती से जीवंत करती है। लाखों दिलों को छू लेने वाली यह केवल एक अधूरी प्रेम कहानी ही नहीं, बल्कि उन युवाओं की जर्नी है जो सपनों, रिश्तों, फाइलों और पहाड़ों के बीच खुद को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। सीरीज़ आपको ये एहसास कराती है कि सपने, सुकून के लिए कितने जरूरी होते हैं। 


अधूरे प्रेम, तलाश और आत्मखोज की खूबसूरत यात्रा

कहानी चंदर, सुधा और प्रीति के दरमियाँ घूमती है। चंदर जो पेशे से इंजीनियर है, जिसे अमेरिका में सुकून नहीं मिला तो अपना करियर छोड़कर भोपाल लौट आता है। माँ की जिद के कारण वह सुधा से मिलता है, जो एक डिवोर्स लॉयर है। सुधा की शादी में कोई दिलचस्पी नहीं रहती वह अपने सपने को पूरा करने पर ध्यान देती है। फिर एक ऐसी घटना घटती है जो दोनों की जिंदगी में एक नया मोड़ ले लेती है। चंदर मसूरी चला जाता है, जहाँ वह एक कैफे खोलता है और प्रीति के साथ जिंदगी का एक नया चैप्टर शुरू करता है। फिर एक दिन सुधा वापिस आती है और कहानी कहीं पहाड़ों में खो जाती है। दोस्ती, प्रेम, बिछड़न, सपने, एंबीशन, उम्मीद और लंबा इंतज़ार जैसे हर इमोशन कहानी का हिस्सा बनकर दर्शकों के मन में सहज रूप से उतरते हैं। कई बार लगता है कि हर मुसाफ़िर की अपनी मंज़िल तो होती है, लेकिन सफ़र के दौरान उसके सपने इवॉल्व होते रहते हैं। पहाड़ों की खूबसूरती, कैफ़े का शांत वातावरण, प्रोमिस वॉल और बैकग्राउंड में चलता म्यूजिक कहानी को रोचक बना देते हैं। सीरीज के  कुछ सीन्स लंबे समय तक याद रह जाते हैं, जैसे वो पल जब सालों बाद चंदर पहली बार मुसाफ़िर कैफे में सुधा को देखता है। 

एक्टिंग, डायरेक्शन और लेखन का जबरदस्त कॉकटेल

निर्देशक रुचिर अरुण ने उपन्यास की आत्मा को बरकरार रखते हुए कहानी को सहज और प्रवाहपूर्ण रखा है। कोई भी किरदार और कैमरा एंगल आपको निराश नहीं करेगा। शारण्या राजगोपाल ने संवादो को इतनी खूबसूरती से पिरोया है कि संवाद बनावटी नहीं लगते, बल्कि किरदारों की भावनाओं को स्वाभाविक ढंग से सामने लाते हैं, जो दर्शकों को कहानी से भटकने नहीं देते। एक्टिंग की बात करें तो सीरीज देखते वक्त ऐसा लगता है जैसे सभी कलाकारों ने अपने-अपने किरदार खुद के अंदर उतार लिए हों। वो किरदार जो अभी तक किताब में कैद थे, पाठकों की कल्पना के अनुसार पर्दे पर उठ खड़े हुए हों। चंदर के रूप में विक्रांत मैसी, सुधा के रूप में वेदिका पिंटो और प्रीति कौशिक के रूप में महिमा मकवाना ने अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी से निभाकर उनमें जान फूँकी साथ ही सीरीज के अन्य एक्टर आदिल हुसैन, राजीव सिद्धार्थ, अनुभा फतेहपुरिया, सादिया सिद्दीकी और लवलीन मिश्रा ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।

क्यों देखें

मुसाफ़िर कैफे उन दर्शकों के लिए एक बेहतरीन अनुभव है जो शोर-शराबे और मसालेदार मनोरंजन से हटकर, दिल को छू लेने वाली कहानियाँ देखना पसंद करते हैं। यदि आप भागदौड़ भरी ज़िंदगी में कुछ पल ठहरकर सुकून महसूस करना चाहते हैं, तो यह वेब सीरीज़ आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाएगी जहाँ प्रेम, सपने, अकेलापन, उम्मीद और खुद की तलाश का एक मिश्रण हो। अगर आपको ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जो खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके साथ चलती रहें, तो मुसाफ़िर कैफे ज़रूर देखिए।

..........................

वेब सीरीज़ :  मुसाफ़िर कैफे
कलाकार : विक्रांत मैसी, वेदिका पिंटो, महिमा मकवाना, आदिल हुसैन, राजीव सिद्धार्थ, अनुभा फतेहपुरिया, सादिया सिद्दीकी, लवलीन मिश्रा
लेखक : शारण्या राजगोपाल (दिव्य प्रकाश दुबे के उपन्यास मुसाफ़िर कैफे पर आधारित)
निर्देशक: रुचिर अरुण
OTT : नेटफ्लिक्स
रिलीज : 24 जुलाई 2026
विधा: रोमांस | ड्रामा |



खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा


प्रिय निखिल !

तुम्हारी किताब का इंतजार मैंने वैसे ही किया जैसी मैंने अपनी पहली किताब का किया था। हॉस्टल की यादें सच में भावुक कर देती हैं और उन्हीं यादों में खो जाने का एक जरिया तुम्हारी किताब है। इसे मैंने वर्ल्ड फाइल से निकलकर एक किताब बनने तक देखा है और कितनी बार इसे पढ़ा। सच बताऊँ तो जिस सफर से आप खुद आए हो उस सफर के किस्से और सबक आपको सिर्फ भावुक करते हैं बोरियत नहीं देते। तुम्हारी पुस्तक हॉस्टल के दिनों की वो यादें हैं जो आज भी कितने ही समझदार होने के बाद भी एक चेहरे पर हँसी दे जाती है। मुझे खुशी है कि मैं इस किताब का हिस्सा रहा। किताब को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी हॉस्टल में ही हूँ और सारे किस्से मेरे सामने टीवी में चल रहे हों।


खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन

अपने गाँव और घर की बेफ़िक्र दुनिया से निकलकर हॉस्टल की अनजानी दुनिया में कदम रखना केवल जगह बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। युवा लेखक निखिल जैन का पहला उपन्यास 'ज़िंदगी जंक्शन' इसी हॉस्टल, दोस्ती और जिम्मेदारी की संवेदनशील कहानी है। उपन्यास का मुख्य पात्र विवान अपने घर और गाँव को छोड़कर हॉस्टल पहुँचता है। शुरुआत में सब कुछ नया, अनजान और चुनौतीपूर्ण लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वही हॉस्टल उसका दूसरा घर बन जाता है। विवान और उसके दोस्तों के बीच बनने वाले रिश्ते, उनकी शरारतें, संघर्ष, सपने और बिछड़ने का दर्द कहानी को जीवंत बना देते हैं।

निखिल की बेहद सरल, सहज और संवेदनशील भाषा पाठक को कहानी के पात्रों से आसानी से जोड़ देती है। यह उपन्यास पाठक को उन हॉस्टल के कमरों तक ले जाता है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। घर से दूर रहने वाला एक छात्र छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से आत्मनिर्भर बनना सीखता है। अपने कपड़े संभालने से लेकर समय का प्रबंधन करने तक, हर अनुभव उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है। यही छोटे-छोटे संघर्ष आगे चलकर जीवन की बड़ी सीख बन जाते हैं। कहानी कहीं आपको हँसाती है, कहीं भावुक करती है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते जिम्मेदारियों का एहसास भी कराती है।

जब कोई व्यक्ति अपना घर छोड़कर हॉस्टल जाता है तो वह केवल चार दीवारें नहीं छोड़ता, बल्कि अपने गाँव की गलियाँ, बचपन के दोस्त, आँगन, सुबह-शाम की यादें और अनगिनत भावनाएँ भी पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है। जीवन के हर मोड़ पर लिए गए निर्णय हमें नई मंजिलों तक पहुँचाते हैं, लेकिन कुछ यादें हमेशा हमारे साथ चलती रहती हैं। आखिर में 'ज़िंदगी जंक्शन' किताब अपने नाम के मुताबिक बताती है कि जीवन वास्तव में एक जंक्शन की तरह है, जहाँ अलग-अलग मंजिलों की तमाम ट्रेनें आती हैं। हर पड़ाव हमें कुछ नया सिखाकर आगे बढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है यादों का एक खूबसूरत सफर जो बस चेहरे पर मुस्कान और आँखों को नम कर जाता है।

यदि आप कभी घर से दूर हॉस्टल में रहे हैं, तो यह उपन्यास आपको अपनी पुरानी यादों से फिर रूबरू करा देगा। और यदि आपने कभी हॉस्टल का जीवन नहीं जिया, तब भी यह किताब आपको उस दुनिया का ऐसा अनुभव कराएगी मानो आप स्वयं उन कमरों, गलियारों और दोस्तों के बीच मौजूद हों। अगर आप भी स्मृति पटल पर निर्जीव पड़ी यादों का फिर से स्वाद लेना चाहते हैं तो इस किताब का डोज़ जरूर लीजिए।





सरकारी नौकरी के सपनों और संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ है 'सरकारी चाय के लिए' | किताबें & सिनेमा

 


आज के समय में सरकारी नौकरी केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सम्मान, सुरक्षा और उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है। प्रेम शंकर चरड़ाना का उपन्यास 'सरकारी चाय के लिए' इन्हीं सपनों, संघर्षों और भावनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। उपन्यास में अटल, माधवी, अमीश, लोकेश और मारसाब केवल काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के प्रतिनिधि हैं जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपना जीवन खपा देते हैं। यही कारण है कि कहानी का हर दृश्य और हर संवाद बेहद सहज और आत्मीय लगता है और बताता है कि लेखक ने कहानी को लिखने से पहले जिया है फिर जाकर लिखा है।

विद्यार्थियों का गाँव से शहर आकर किराए का कमरा ढूँढना, बेहतर कोचिंग की तलाश, सीमित संसाधनों में गुज़ारा करना, परिवार की उम्मीदों का बोझ और हर परीक्षा के बाद परिणाम की बेचैनी ऐसी कई चीजों को उपन्यास बड़ी संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह उन युवाओं की कहानी है जो कोचिंग की गलियों, किराए के कमरों और भीड़भरी लाइब्रेरियों में हर दिन अपने भविष्य को लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जो अकेलेपन से लड़ते हैं, असफलताओं के बाद फिर खड़े होते हैं और उस एक "PDF" में अपना नाम खोजते हैं, जिसके बाद वर्षों का संघर्ष परिवार की खुशियों में बदल जाता है।

पढ़ते-पढ़ते महसूस होता है कि इस सफर में परीक्षाएं देते-देते विद्यार्थी कब आदमी बन जाता है, कब उसके अपने पीछे छूट जाते हैं उसे पता ही नहीं चलता। इस कहानी में प्रेम है, विफलता है, बिछड़न है, उम्मीद है और सबसे बड़ा सवाल भी—क्या सरकारी नौकरी ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है? यही प्रश्न पुस्तक को सामान्य कथा से आगे ले जाकर एक गंभीर सामाजिक विमर्श में बदल देता है। कहानी अपने शीर्षक की तरह पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है कि अंतिम पृष्ठ के बाद भी इसके पात्र और उनके सवाल पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

'सरकारी चाय के लिए' पढ़ते हुए बार-बार एहसास होता है कि कई घरों में सरकारी नौकरी केवल नौकरी नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान पर लगने वाला पूर्ण विराम होती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह हर उस पाठक के दिल तक पहुँचता है जिसने कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा का सपना देखा हो या ऐसे किसी सपने को अपने घर में जीते हुए देखा हो।

किताब: सरकारी चाय के लिए
लेखक: प्रेम शंकर चरड़ाना
प्रकाशक: पंक्ति प्रकाशन
समीक्षक : सोमिल जैन 'सोमू'



ई-कल्पना पत्रिका में कैसे छपवाएं अपनी कहानियां : मानदेय के साथ प्रोत्साहन भी, पूरी प्रक्रिया जानिए....लिखो और कमाओ

 


ई-कल्पना पत्रिका युवा लेखकों के लिए बेहतरीन मंच है। यह पत्रिका ना सिर्फ लेखक की रचना प्रकाशित करती है बल्कि उचित मानदेय भी देती है। जो कलमकार लिखने में रुचि रखते हैं और कहानियों को पन्ने पर उतारना जानते हैं उनके लिए यह पत्रिका प्रोत्साहन प्रदान करती है और शानदार मौका देती है। अगर आप भी कहानी लिखते हैं तो ई-कल्पना को अपनी कहानी लिख भेजिए। प्रक्रिया मैं आपको बताता हूं।

सबसे पहले अपनी पूरी कहानी को वर्ड फाइल में समेटकर ई-कल्पना के ऑफिशियल ईमेल आईडी पर 'ई-कल्पना में प्रकाशनार्थ कहानी' विषय के साथ वर्ड फाइल अपलोड कर ekalpnasubmit@gmail.com पर मेल कर दीजिए। बहरहाल कुछ ही दिनों (लगभग एक हफ्ता) में पत्रिका की तरफ से आपको मेल आएगा। मेल मे लिखा होगा कि आपकी कहानी पढ़ी जा रही है। आपकी रचना की स्वीकृति-अस्वीकृति के निर्णय पर पहुंचने पर जल्द आपसे  संपर्क किया जायेगा। और अगर आपके द्वारा भेजी गई कहानी कहीं और प्रकाशित हो रही है तो तुरंत अवगत कराएं।

कुछ दिनों बाद ई-कल्पना की तरफ से कहानी की स्वीकृति-अस्वीकृति को लेकर मेल आएगा। अगर आपकी कहानी अस्वीकृत हुई हो तो फिर आगे कोई बात ही नहीं लेकिन अगर आपकी कहानी स्वीकृत हुई होगी तो पत्रिका का अगला अंक जब भी प्रकाशित होगा आपको बताया जाएगा। उसके बाद आपसे फोटो और आपका परिचय मांगा जाएगा। (आप जब कहानी भेजें तब भी अपना परिचय और फ़ोटो भेज सकते हैं)

ध्यान देने योग्य बात ये है कि इस मेल में एक नोट भी लिखा रहेगा जिसे आप ध्यान से पढ़िए। नोट होगा - अपनी कहानी के लिये आपको  प्रकाशन के समय  ₹2000 का मानदेय प्राप्त होगा. हम आपसे उम्मीद करते हैं कि इस शुभ समाचार को आप मित्रों में व सोशल मीडिया में शेयर करेंगे.  यदि आपको लगता है कि आप ऐसा नहीं कर सकते तो हमें तुरंत बताएं. साथ में, यदि इस दौरान आपकी यह कहानी कहीं और प्रकाशित हो गई हो, या फिर पूर्व प्रकाशित है, तो भी हमें ज़रूर सूचित करें, और अपनी कोई और अप्रकाशित कहानी भेजें. उसे हम प्रकाशन विचारार्थ सखुशी पढ़ेंगे.
यदि आप सेशल मीडिया में हैं तो कृपया ई-कल्पना को फ्रैंड-रिक्वैस्ट भेजें या फिर अपना पता दें और हम आपसे फ्रैंड रिक्वैस्ट करेंगे.

फिर आपके पास अगल मेल आएगा जिसमें पत्रिका के नियम और शर्ते बताई जाएंगी जिन्हें आप बहुत ध्यान से पढ़िए और समझिए।

1. यदि आपकी कहानी प्रकाशन तिथि से पहले किसी अन्य पत्रिका में प्रकाशित होती है तो कृपया हमें ज़रूर और तुरंत इत्तिला करें. 
2. यदि आप सोशल मीडिया में शामिल हैं, तो अपनी प्रकाशित कहानी मित्रों में ज़रूर शेयर करें. हमने देखा है कई लेखक काफी सक्रिय होने के बावजूद हमारी पत्रिका में प्रकाशित अपनी कहानी अपने मित्रों में साझा नहीं करते हैं. इससे उनके उत्साह का अभाव झलकता है, साथ में हम ये भी समझते हैं कि ई-कल्पना द्वारा सम्मानित लेखक ई-कल्पना को सपोर्ट करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता. 
उपर्युक्त दशाओं के उल्लंघन का (यानि, पूर्वप्रकाशित होना, या सोशल मीडिया में सक्रिय होने के बावजूद कहानी को शेयर न करना), इन दोनों का असर बिलकुल मानदेय के वितरण में भी होगा. 
3. यदि आपने अब तक अपनी बायो व फोटो नहीं भेजी है, तो कृपया भेजेंअपनी कहानी हमें भेजने के लिये धन्यवाद।

और फिर प्रक्रिया के अनुसार ई -कल्पना की वेबसाइट ऑफिसियल वेबसाइट https://www.ekalpana.net/ पर सबसे पहले आपकी कहानी प्रकाशित होगी। उसके बाद जब आपकी कहानी पत्रिका में प्रकाशित होगी तब आपके पास इस तरह का में आएगा।

प्रिय लेखक, नमस्कार ! आपकी कहानी पाँच कहानियाँ के __वें संकलन में प्रकाशित हो चुकी है. कहानी के लिये आपको ₹ 2000 की राशि मानदेय के तौर पर दी जाएगी, जो आपके अकाऊंट में ई-कल्पना के इंडस-इंड के गुड़गांव ब्रांच से वायर ट्रांस्फर की जाएगी. 
कृपया अपने बैंक डीटेल (निम्नलिखित) भेजें.

Name:
Bank Name:
Account number:       
Bank IFSC:

हमारी दिली कोशिश है कि ज़्यादा लोग अच्छी कहानियाँ पढ़ने की और लिखने की आदत डालें, प्रकाशन के लिये भी भेजें. इसलिये यदि आप अपनी इस प्रकाशित कहानी को मित्रों में व सोशल मीडिया में शेयर करें तो हम आपके आभारी होंगे.  आपकी कहानी ई-कल्पना ब्लॉग में सदा प्रकाशित रहेगी, इसे आप या आपके मित्र निःशुल्क पढ़ सकते हैं. 

संकलन की प्रत्येक प्रति रु 95 में पत्रिका के साइट (इस लिंक) पर उपलब्ध है.  40वाँ संकलन खरीदने का लिंक यहाँ है. आगे - कहानियाँ लिखते रहें,  अपनी नई कहानियाँ भेजते रहें. हमें आपकी कहानियों का इंतज़ार रहेगा. सधन्यवाद

मुक्ता सिंह-ज़ौक्की
सम्पादक, ई-कल्पना

यही ई-कल्पना पत्रिका में अपनी कहानियां भेजने की पूरी प्रक्रिया है। अगर आप कहानियां लिखते हैं तो देर मत कीजिये पत्रिका ने अगले अंक के लिए कहानियां पढ़ना शुरू कर दिया है। विशेष ध्यान दें : ई-कल्पना अनगिनत कहानियों में बेहतरीन कहानियां छापती है इसलिए लेखन पर जोर दें और इसके लिए पत्रिका ने अपनी गाइडलाइन वेबसाइट दी है जो मैं यहां शेयर कर रहा हूँ।

अपनी कहानियाँ भेजिये ...
आपकी कहानी - ● पूर्व प्रकाशित न हो
● एक अच्छी कहानी का स्वरूप बनाए रखें, यानी कि भाषा, विडम्बना, कथानक, इत्यादि न भूलें ... भाषा अच्छी ही न हो, वर्तनी व व्याकरण का भी ध्यान दें
● यूनिकोड फांट में हो. (नोट – कृति देव यूनीकोड फांट नहीं है. कई लेखक हमें कृति देव में शायद यह सोचकर भेजते हैं कि इसे बस कनवर्ट ही तो करना है, कर लेंगे ये लोग. जी हाँ, यही करना पड़ता है हम लोगों को, क्योंकि हम आपकी कहानियाँ पढ़ने को अधीर हो रहे होते हैं. मगर यह बात भी सही है कि जब पढ़ने को बहुत सारी कहानियाँ होती हैं, तो वो कहानियाँ जो कृति देव में टंकित की जाती हैं, कई बार रह जाती हैं)
यदि उपर्युक्त सभी बातों में आपकी कहानी खरी उतरती है, तो हमारी सम्पादकीय टीम उसे बहुत प्रेम से पढ़ेगी।


प्रकाशनाभिलाशी लेखकों के लिये सूचना

1. यदि आपको कहानी प्राप्ति पत्र मिल चुका है, लेकिन स्वीकृति/अस्वीकृति निर्णय पत्र नहीं मिला है, तो कृपया इंतज़ार करें. कहानियाँ लगातार पढ़ी जा रही हैं.
2. मानदेय के विषय में - लेखक के काम का मूल्य होता है, इसलिये हर स्वीकृत कहानी को हम मानदेय देते हैं. हर स्वीकृति पत्र में हम लेखक से प्रकाशन की सूचना अपने मित्रों में सोशल मीडिया के ज़रिये प्रसारित करने की विनती भी करते हैं. इससे, पहले तो लेखक का उत्साह झलकता है, साथ में पत्रिका का भी प्रसार होता है. पत्रिकाओं को पाठकों की ज़रूरत है, यह एक लॉजिकल सच है. अकसर हमने देखा है कि लेखक सोशल मीडिया में सक्रिय होने के बावजूद ई-कल्पना में प्रकाशित अपनी कहानी साझा नहीं करते हैं. इसे हम केवल एक तरह से देखते हैं - कि लेखक ई-कल्पना को बॉयकौट कर रहे हैं. सामान्यतः हम उम्मीद करते हैं कि प्रकाशन के एक हफ्ते के दौरान लेखक कहानी को साझा कर अपना गर्व भी साझा करेंगे. इसलिये हमारे सम्पादक मंडल ने तय किया है कि यदि आप सोशल मीडिया में सक्रिय हैं और ई-कल्पना में प्रकाशित अपनी कहानी को साझा नहीं कर रहे हैं,  तो यह आपकी मर्ज़ी है, लेकिन कहानी के मानदेय के वितरण में इसका असर पड़ सकता है.

पत्रिका को लेकर मेरा अनुभव

यह पूरी प्रक्रिया ही मेरा अनुभव है। इसी प्रक्रिया के साथ ही मेरी कहानी भी प्रकाशित हुई।  ई-कल्पना पत्रिका का मेल गणतंत्र दिवस पर प्राप्त हुआ (स्क्रीन शॉट अटैच कर रहा हूँ)। यह पहली बार है जब ई-कल्पना से मुझे मानदेय मिल रहा है। ऐसी पत्रिकाओं का खूब प्रचार और प्रसार होना चाहिए। नए लेखकों के लिए यह अच्छा प्लेटफॉर्म है। ई-कल्पना पत्रिका में पिछले दिनों मेरी कहानी 'लॉकडाउन कोटा' प्रकाशित हुई थी। 

अगर आप कहानियां लिखते हैं तो अपनी रचनाओं को ई-कल्पना को भेज सकते हैं। आपकी रचनाएं यहां प्रकाशित होंगी तो आपको पारिश्रमिक भी मिलेगा और रचना पांच कहानियों के संकलनन में ई-मैग्जीन के तौर पर भी प्रकाशित होगी। जिसमें आप अन्य लेखकों की कहानियां भी पढ़ सकते हैं।



ई-कल्पना की कोविड कहानी सीरीज़ में प्रकाशित सोमिल जैन सोमू की लिखी कहानी "लॉकडाउन कोटा"*

https://www.ekalpana.net/post/ekalpanacovidstorysomiljainsomuhttps://www.ekalpana.net/post/ekalpanacovidstorysomiljainsomu

Blog कैसे बनायें? Step by Step in Hindi



वो बड़ी बातें जो पठान को बनाएगी सुपर-डुपर हिट, इन कारणों से पठान करेगी बॉलीवुड पर राज, शाहरुख के सिर पर सजेगा ताज


पिछले दो-चार सालों से बॉलीवुड इंडस्ट्री में सूखा पड़ा हुआ है, वजह ये नहीं कि फिल्में नहीं बन रही वजह यह है कि फिल्में चल नहीं रहीं। कितने विरोध के बाद भी शाहरुख खान की आने वाली फिल्म पठान बॉलीवुड में पड़े अकाल का हल निकालेगी.... 

लोगों को पठान को लेकर इतना क्रेज बढ़ गया है कि उसकी एडवांस बुकिंग ने अभी तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, KGF, बाहुबली जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में पठान के आगे पानी भरती नज़र आ रही हैं, रिलीज से पहले इस फिल्म ने कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए हैं....चलिए आपको पठान फ़िल्म को लेकर कुछ ऐसी बातें बताते हैं जो पठान को इस साल की सुपर डुपर हिट बनाएंगी......


पहली बड़ी बात यह है कि शाहरुख के लिए लोगों की दीवानगी देखकर मुंबई में बांद्रा स्थित सबसे बड़ा सिंगल स्क्रीन थियेटर ‘गेटी’ अपनी सालों पुरानी परंपरा तोड़ने जा रहा है। ‘गेटी’ में ‘पठान’ का पहला शो सुबह नौ बजे शुरू होगा, और यह अपने आप में रिकॉर्ड होगा....इसके अलावा भी कुछ ऐसे बड़े फैक्ट्स हैं जिससे ‘पठान’ को हिंदी की सबसे अनूठी और बेमिसाल फिल्म साबित होती हैं....


पठान के साथ दूसरी अनूठी बात यह है कि यशराज फिल्म्स की यह स्पाय यूनिवर्स की कटेगरी की फिल्म है जिसका एंड मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स की फिल्मों की तरह ही होगा, जिसमें 2 क्रेडिट सीन दिये जाएंगे, भारत में ऐसा पहली बार होगा....

तीसरी बात पठान में किसी भी हिंदी फिल्मों में अब दिखाये गये एक्शन सीन से बिल्कुल हटकर एक्शन इस फिल्म में दिखाया जायेगा. ‘पठान’ में दर्शकों का दिल धड़काने वाला एक्शन आईमैक्स फॉर्मेट में होगा. कहा जा रहा है भारत में अब तक IMAX FORMAT में फिल्म नहीं बनी है.....

चौथी बात हाल की टेररिज्म थीम वाली तमाम हिंदी फिल्मों में ऐसे किरदार को विलेन के तौर पर दिखाया गया है जिसे कहीं ना कहीं किसी एक खास मजहब का बताया गया है लेकिन ‘पठान’ में आतंकवाद या आतंकवादी को किसी धर्म से जुड़ा हुआ नहीं बताया जायेगा....

पांचवीं बात भी इस फिल्म के लिए काफी अनूठी है। पठान पहली ऐसी फिल्म होगी जिसकी शूटिंग स्पेन के MALLORCA ISLAND पर हुई है, हालांकि इस फिल्म के बाद इस आइसलैंड पर रणबीरश्रद्धा कपूर की फिल्म की शूटिंग की जा रही है.....

गौर करने वाली छटी बात ये भी है कि हिंदी बॉक्स ऑफिस पर देशभक्ति से जुड़ी फिल्में हमेशा से हिट होती हैं। फिल्म पठान में शाहरुख एक भारतीय खुफिया जासूस के रोल में हैं। इसके तहत वह अपनी खुफिया जासूसों पर आईं पिछली फिल्मों टाइगर और वॉर के हीरोज सलमान खान और रितिक रोशन को इसकी आने वाली फिल्मों में साथ लाएंगे। चर्चा तो यह भी है कि पठान में सलमान भी बतौर टाइगर नजर आएंगे....

इसके अलावा बहुत सी खास बातें हैं जिनकी वजह से पठान का हिट होना निश्चित है.. बॉलीवुड के बड़े बड़े सुपरस्टार शाहरुख खान की पठान के सपोर्ट में आ रहे हैं, सुनील शेट्टी करीना कपूर और अब अजय देवगन ने भी पठान की तारीफ की है अजय देवगन ने कहा कि  ‘जिस तरह से इस फिल्म की एडवांस बुकिंग हुई है ऐसा पहले किसी फिल्म की नहीं हुई। मैं दिल से बहुत खुश हूं....

आपको क्या लगता है क्या पठान ब्रेक कर पाएगी बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड या जनता शाहरुख को कर देगी आउट ऑफ बॉक्स? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर बताइए

पठान ने बड़े पर्दे पर आते ही मचाई ग़दर, हाउस फुल हुए सारे सिनेमाघर, पब्लिक का आ रहा जबरदस्त रिएक्शन, बोले- फुल पैसा वसूल मूवी

खत्म हुआ इंतज़ार आ गई पठान……आज पठान फिल्म सारे सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है।शाहरुख खान के फैंस 4 साल के लंबे समय के बाद शाहरुख खान को बड़े पर्दे पर देखकर बहुत ही खुश हैं। स्पाय यूनिवर्स केटेगरी की इस मूवी में वीएफएक्स कमाल के हैं। मूवी एंटरटेनिंग है और पूरी फिल्म अपने लक्ष्य से भटकती नहीं है बल्कि ऑडियंस को आखिर तक पकड़े रहती है। पठान फैंस की उम्मीदों पर खरी साबित हो रही है, फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने वाले लोग पठान की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं, शाहरुख ने पठान से फैंस के दिल जीतने के साथ बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया है।

बात अब फ़िल्म की स्टोरी की करें तो पठान में शाहरुख खान RAW एजेंट बने हैं। वे देश को बचाने के लिए दुश्मनों से लड़ते दिखे हैं। शाहरुख का फिल्म में अब तक का सबसे अलग और अनोखा अवतार दिख रहा है। वे फुल एक्शन मोड में हैं। शाहरुख ने अपनी बॉडी पर भी काफी मेहनत की है। दीपिका संग शाहरुख की केमिस्ट्री देखने लायक है। जॉन अब्राहम भी फिल्म में लीड रोल में हैं। शाहरुख खान फिल्म में सही कहते हैं कि कुर्सी की पेटी बांध लीजिए मौसम बिगड़ने वाला है, अब दर्शकों ने फिल्म को देखकर यही बोला कि सच में मौसम बिगड़ गया…ऐसी फाड़ू एक्टिंग देखकर लोग दंग रह गए हैं।

वही पठान से पहले सलमान खान की फिल्म किसी का भाई किसी का जान का टीजर भी लॉन्च हुआ है जो एकदम रोंगटे खड़े कर देने वाला है, और पठान फिल्म में सलमान खान का 10 मिनट के कैमियो रोल ने जनता के फुल पैसे वसूल कर लिए… थिएटर्स के मालिक बोल रहे हैं कि ऐसी फिल्में आती रहेंगी तो हम जिंदा रहेंगे। अब बात करते हैं आपकी, पठान फिल्म आपको कैसी लगी यह बात हम तक कमेंट करके पहुंचाइये….

Blog कैसे बनायें? Step by Step in Hindi

 

Blog बनाना सीखें- blog कैसे बनायें? Step by step in hindi

नमस्कर दोस्तों ! 

बहुत सारे लोग मुझसे पूछते हैं कि ब्लॉग कैसे बनाते हैं। हम आपके ब्लॉग पढ़ते हैं और हम भी लिखना चाहते हैं लेकिन हमारे पास आईडिया नहीं है कि ब्लॉग कैसे बनाते हैं तो आज मैं सरल तरीके से step by step ब्लॉग बना कर बताता हूँ।

Free Blog और Website बनाने के लिए इंटरनेट पर कई सारे Platform मौजूद है। लेकिन ब्लॉग में और वेबसाइट में अंतर होता है। आज हम  blogger.com पर ब्लॉग कैसे बनाये ये जानेंगे।

आपके अंदर भी कई विचार आते हैं और उन्हें आप मोबाइल में टाइप करके रख लेते हैं लेकिन आपको ये पता नहीं होता कि इन विचारों को शेयर कैसे करें? कोई आसान प्लेटफॉर्म है जिससे लोग वहाँ जाकर मेरे विचार पढ़ सकें? वही काम आसान किया है ब्लॉगर ने जहाँ आप आसानी से अपने विचार पोस्ट कर सकते हैं और लोगों को भेज सकते हैं।

जैसा कि आप जानते हैं कि आज इंटरनेट बहुत ही सस्ता हो गया है। इसलिए उसका सही इस्तेमाल करना हमें आना चाहिए। ब्लॉग बनाने के लिए हमें सबसे पहले गूगल पर जाना होगा। blogger, google का ही एक प्रोडक्ट है।

step by step

1. सबसे पहले आप गूगल पर www.blogger.com सर्च करिये।

2. ब्लॉग बनाने के लिए Gmail Account से आप sign up करिये।

3. अब आपको दो option नज़र आते है Google+ Profile और Blogger Profile दोनों में से किसी एक को select करें और Profile set करें। इसके बाद Create Blog पर क्लिक करें और नीचे दिए गए Step को follow करें।

4. Title वाले कॉलम में अपने blog का Title लिखे.जैसे मेरे ब्लॉग का नाम है "तजुर्बातbyसोमू" जो आप अपने ब्लॉग का नाम देना चाहें वो आप दे सकते हैं। जरूरी बात ये कि इसे बाद में आप चेंज भी कर सकते हैं।

5. Address वाले कॉलम में अपने blog का address लिखें।  यह वो address है जिसे लोग Google में सर्च करके आपके blog तक पहुँचते हैं जैसे somiljainesomu.blogspot.com मेरा ब्लॉग एड्रेस है। अगर आपके द्वारा दिया गया address available होगा तो आपको “This Blog address is available” मैसेज दिखाई देगा।

6. जब "This Blog address is available" आ जाये तो उसके बाद NEXT वाला ऑप्शन click करें और आपका ब्लॉग तैयार हो जाएगा।

ब्लॉग सीरीज में ये पहला ब्लॉग था जिसमें बताया कि ब्लॉग कैसे बनाते हैं। आगे भी step by step ब्लॉग कैसे लिखते हैं और कैसे blog से पैसे कमाए जाते हैं ये सब बताऊंगा। इससे रिलेटेड कोई भी समस्या आपको आये तो कमेन्ट करके हमें बताएं।

कलमकारों से मुलाकात EP#1

 

पहली मुलकात - इंजीनीयर आनंद पटेल 

  


आखिरकार इंतज़ार खत्म हुआ। अमेज़न किंडल पर "लाइफ इंस्ट्रूमेंटकिताब  ही गई है और पेपरबैक में भी किताब लाइव हो गई है।

मसलनइस किताब के लेखक इंजीनियर आनंद पटेल जी से मेरी अभी तक मुलाक़ात नहीं हुई हैं लेकिन फिर भी उन्होंने मुझ पर भरोसा  करके अपने सपने को साकार करने के लिए मुझे चुनामुझे इसका हिस्सा बनाया इसका मैं हमेशा आभारी रहूँगा क्योंकि किसी भरोसा कमा पाना दुनिया की सबसे बेहतर चीजों में से एक है।
बीता साल वैसे तो अनेक चुनोतियों से संघर्ष करते हुए गुजरा लेकिन इसी साल के आखिरी महीने में मेरे पास आनंद जी का मैसेज आया और मैंने तुरंत उनकी बात समझी और किताब के कार्य को पहली प्राथमिकता दी। उसके बाद फिर घंटों कॉल पर समझने-समझाने का दौर चलता रहा। कुछ  ही दिनों में किताब की टाइपिंग और संपादन का काम हो गया लेकिन कवर डिजाइन और इंटीरियर डिजाइन का काम बाक़ी था। फिर उसकी भी कोशिशें प्रारंभ हुईं चली और कई प्रयासों के बाद ये काम भी सफल हुआ। मैं भोपाल  गया था इसलिए बुक को ज्यादा टाइम नहीं दे पा रहा था। कारण था कि नौ -दस महीने बाद भोपाल वापिस आकर यहाँ सब सेट करने में टाइम लगता है इसलिए आनंद जी और मेरे बीच अनबन शुरू हो गई। फिर एक ऐसा मोड़ आया कि मैं उस समय से इस क़िताब का हिस्सा नहीं था पर मन अभी भी कह रहा था कि आपसी मतभेद को भुलाकर उस सपनें में शामिल हुआ जाए जो वाकई उत्साहित करता है। लेखक साहब ने फिर मुझपर भरोसा किया और मैंने पब्लिकेशन देखना स्टार्ट कर दिया।अंततः OCEANINK PUBLICATION तक आकर यह बात रुकी। मकर संक्रांति के दिन किंडल पर ये क़िताब रिलीज हुई।

कई बातोंविचारों के आदान-प्रदान के बाद लेखक और संपादक के बीच एक नायाब रिश्ता कायम हो जाता है जो एक दूसरे पर एक भरोसा कायम करता है। आज हमारी इंटरव्यू ब्लॉग सीरीज "एक मुलाकात आपसेमें सबसे पहले "लाइफ इंस्ट्रूमेंटके लेखक से कुछ सवालों के साथ रूबरू होंगे।



संपादक :- आपने अपने विशेष क्षेत्र या शैली में लिखना क्यों चुनायदि आप एक से अधिक किताब लिखते हैंतो आप उन्हें कैसे संतुलित करेंगे?

लेखक:- मैंने मोटिवेशनल थॉटस को लिखना इसलिए आरंभ किया क्योंकि आज के दौर में इंसान शारीरिक रूप से तो मजबूत है लेकिन मानसिक कमजोरी इंसान को निगलती जा रही है। रही बात दूसरे क्षेत्र या शैली को लिखने की तो यही कहूँगा जो मैं अपने चारों ओर घटित होते हुए देखता हूँ उसे किताब के पन्नों पर उतार देता हूँ और यह मेरे लिए अब बहुत सहज हो गया है।

संपादक :- आप लेखन / पठन / कहानी / लेखन आदि में क्या सांस्कृतिक मूल्य देखते हैं?
लेखक:- लेखन और पठनपाठन सांस्कृतिक प्रक्रिया है जितना ज्यादा हम पढ़ते हैं उतना ज्यादा संस्कृति के नजदीक खुद को पाते हैं।

संपादक :- इस पुस्तक के जरिये आपके लक्ष्य और इरादे क्या थेऔर आप उन्हें कितना अच्छा महसूस करते हैं?
लेखक :- यह पुस्तक आज के समाज की सख्त जरूरत है इससे इसकी विशेषता का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह जीवन के प्रत्येक सकारात्मक लक्ष्य को हासिल करने में सरल और प्रभावी पथ प्रशस्त् करती है!

संपादक :- आपको क्या लगता है कि आपके लेखन में सबसे अधिक विशेषता क्या है? और इस पुस्तक को लिखने का सबसे कठिन हिस्सा?

लेखक:- इस पुस्तक की अहम् खूबी है कि इसमे कम शब्दों में ज्यादा सार्थक मोतियों को पिरोया गया है। यह जीवन की भूल भुलैया को सुलझाने में सबसे मददगार मित्र की तरह है। रही बात कठिन हिस्से की तो मैंने इस पूरी पुस्तक को शिद्दत के साथ दिल से लिखा है इसीलिए मुझे इसके हर पन्नेहर लाइन और हर शब्द से बेइंतहा मोहब्बत है!

संपादक :- आपको लिखना सीखने में सबसे उपयोगी क्या लगाक्या कम से कम उपयोगी था या सबसे विनाशकारी था?
लेखक:- मेरे जीवन में आए उतार चढ़ावअसफलताओं और अनगिनत ठोकरें सीखने का सबसे महत्वपूर्ण साधन रहे हैं। असफलताओं ने मुझे हर स्तर पर मजबूतबहादुर और पहले से कहीं ज्यादा समझदार बनाया है!

संपादक :- क्या आप पूर्णकालिक या अंशकालिक लेखक हैंयह आपके लेखन को कैसे प्रभावित करता है?
लेखक :- खुद को पूर्ण कालिक या अंश कालिक लेखक के बंधन में बाँध कर मैं स्वयं के साथ अन्याय करूँगा क्योंकि मेरा संपूर्ण जीवन लेखन हैमेरा जीवन और लेखन एक सिक्के के दो पहलू हैं एक के बगैर दूसरे का अस्तित्व नहीं हैलेखन मेरे जीवन का नायाब पहलू है जो मुझे हर पल बेहतरी की ओर ले जाता है!

संपादक :- आप कैसे लिखते हैं या लिखने के लिए समय निकालते हैं?

लेखक:- हर वक़्त जब मैं मेरे जीवन मे भावों का समंदर महसूस करता हूँइसे समेट कर किताब में उतार देता हूँ। एक बार फिर कहूँगा लेखन मेरे लिए जीवन है और जीवन के लिए समय निकाला नहीं जाता बल्कि जीवन के लिए ही समय है।

संपादक :- लेखन समुदाय में आपकी क्या भूमिका है?
लेखक:- लोगों के जीवन में सकारात्मकता का संचार हो इस उद्देश्य से लिखता हूँ और बहुत हद तक आप सब के सहयोग और आशीर्वाद से इसमे सफल भी हो रहा हूँ!

संपादक :- भविष्य की परियोजनाओं के लिए आपकी योजनाओं में क्या-क्या शामिल है?

लेखक:- एक सकारात्मक समाजजिम्मेदार नागरिक और सभ्य और संवेदनशील देश की आकांक्षा लिए लेखन पथ पर सतत् चलते जाना चाहता हूँ आप सब को साथ लेकर।

आनंद जी आप के साथ इस पुस्तक का सफर शानदार रहा और ये इंटरव्यू भी मजेदार हुआआपका आभार!



लेखक आनंद पटेल जो संघर्षों के परे जीवन को जीने की कला में ना सिर्फ़ विश्वास रखते हैं बल्कि उन्होंने अपने जीवन में इसे चरितार्थ भी किया है छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव दलपतपुरा से आप ताल्लुक रखते हैं। आठवीं तक गाँव से शिक्षा पूरी कर छतरपुर आएसिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया भोपाल में

लेखक से जुड़ें-
फेसबुक- Anand kumar patel
                                    whatsapp- 9993727334 
                                    instagram- @democratanand  


इसी तरह लेखकों से रुबरु होने का सिलसिला चलता रहेगा। आप इसे पढ़िए और विचार व्यक्त करिये।   

कलम क्या-क्या लिखाए

पुरुषों के अनकहे दर्द और ध्वस्त संवेदनाओं को छूकर जाता काव्य-संग्रह : एकांत में रोता पुरुष | किताबें & सिनेमा

कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष...