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कलम क्या-क्या लिखाए

सरकारी नौकरी के सपनों और संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ है 'सरकारी चाय के लिए'

  आज के समय में सरकारी नौकरी केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सम्मान, सुरक्षा और उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है। प्रेम शंकर चरड़ाना का उपन्यास 'सरकारी चाय के लिए' इन्हीं सपनों, संघर्षों और भावनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। उपन्यास में अटल, माधवी, अमीश, लोकेश और मारसाब केवल काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के प्रतिनिधि हैं जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपना जीवन खपा देते हैं। यही कारण है कि कहानी का हर दृश्य और हर संवाद बेहद सहज और आत्मीय लगता है और बताता है कि लेखक ने कहानी को लिखने से पहले जिया है फिर जाकर लिखा है। विद्यार्थियों का गाँव से शहर आकर किराए का कमरा ढूँढना, बेहतर कोचिंग की तलाश, सीमित संसाधनों में गुज़ारा करना, परिवार की उम्मीदों का बोझ और हर परीक्षा के बाद परिणाम की बेचैनी ऐसी कई चीजों को उपन्यास बड़ी संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह उन युवाओं की कहानी है जो कोचिंग की गलियों, किराए के कमरों और भीड़भरी लाइब्रेरियों में हर दिन अपने भविष्य को लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जो अकेलेपन से लड़ते हैं, असफलताओं के बाद फिर खड़...
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ई-कल्पना पत्रिका में कैसे छपवाएं अपनी कहानियां : मानदेय के साथ प्रोत्साहन भी, पूरी प्रक्रिया जानिए....लिखो और कमाओ

  ई-कल्पना पत्रिका युवा लेखकों के लिए बेहतरीन मंच है। यह पत्रिका ना सिर्फ लेखक की रचना प्रकाशित करती है बल्कि उचित मानदेय भी देती है। जो कलमकार लिखने में रुचि रखते हैं और कहानियों को पन्ने पर उतारना जानते हैं उनके लिए यह पत्रिका प्रोत्साहन प्रदान करती है और शानदार मौका देती है। अगर आप भी कहानी लिखते हैं तो ई-कल्पना को अपनी कहानी लिख भेजिए। प्रक्रिया मैं आपको बताता हूं। सबसे पहले अपनी पूरी कहानी को वर्ड फाइल में समेटकर ई-कल्पना के ऑफिशियल ईमेल आईडी पर 'ई-कल्पना में प्रकाशनार्थ कहानी' विषय के साथ वर्ड फाइल अपलोड कर ekalpnasubmit@gmail.com पर मेल कर दीजिए। बहरहाल कुछ ही दिनों (लगभग एक हफ्ता) में पत्रिका की तरफ से आपको मेल आएगा। मेल मे लिखा होगा कि आपकी कहानी पढ़ी जा रही है। आपकी रचना की स्वीकृति-अस्वीकृति के निर्णय पर पहुंचने पर जल्द आपसे  संपर्क किया जायेगा। और अगर आपके द्वारा भेजी गई कहानी कहीं और प्रकाशित हो रही है तो तुरंत अवगत कराएं। कुछ दिनों बाद ई-कल्पना की तरफ से कहानी की स्वीकृति-अस्वीकृति को लेकर मेल आएगा। अगर आपकी कहानी अस्वीकृत हुई हो तो फिर आगे कोई बात ही नहीं लेकिन ...

गुरूर नहीं बस मिजाज में खुद्दारी बहुत है.....

मुझसे अगर कोई पूछे कि तुम्हारी नज़र में सबसे ज्यादा अमीर कौन है तो मैं बिना रुके, बिना हिचकिचाएं जवाब दे सकता हूँ। मेरा जवाब होगा 'जिसका आत्म सम्मान जिंदा है वो सबसे ज्यादा अमीर है'। मैंने ऐसे बहुत सारे उम्रदराज लोग देखें हैं जिनके अंदर खुद्दारी इतनी की मर जायेंगे लेकिन किसी के आगे मांगने नहीं जाएंगे। वो अपनी मेहनत और संघर्ष से कमाई चीजों से खुश हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उन चीजों में वो गर्व महसूस करते हैं। एक अपनापन लगता है कि ये चीजें मेरी हैं इनपर कोई और अधिपत्य नहीं जमा सकता ना कह सकता है कि शर्म करो ये तुम्हारी चीजें थोड़ी हैं। नोकरी करने वाले आदमी को ऐसा समझा जाता है कि उसका आत्म सम्मान कहाँ हैं। दूसरे के यहां, दूसरे के लिए काम कर रहा है इससे सेल्फ रेस्पेक्ट तो मर गई न? आत्म सम्मान तो खुद का धंधा करने में हैं। बिल्कुल बात सत्य है लेकिन क्या नोकरी करने वाला इंसान किसी से भीख मांग रहा है? सुबह से शाम किसी कंपनी को अपना वक्त, सारे एफर्ट्स, जो सीखा उसने सब झोंक देता है तो उसकी मेहनत की सैलरी मिलनें में आत्म सम्मान कहाँ खत्म हो गया? अगर यही एम्प्लॉय एक दिन काम पर ...

सब्र कर पथ के मुसाफिर...सब्र कर...

जब बचपन में सुनते थे कि सब्र करो छोटू, सब्र का फल मीठा होता है। उस समय शायद समझ नहीं आया कि सब्र क्या होता है। धीरे-धीरे जीवन की गाड़ी आगे बढ़ी तो समझ आया चीजें ऐसे ही चलती हैं औऱ धैर्य जीवन का सच्चा साथी है। लगभग एक-डेढ़ महीने से धैर्य, सब्र, इंतज़ार का सच्चा मतलब समझ आ रहा है। अनेकों विवादों में मन फसा, सम्मान-अपमान ना जाने कितनी व्यथाओं में उलझा मन सब्र की गहराइयों को नाप रहा है। जीवन चक्र ही ऐसा है जो परिवर्तन मांगता है। परिवर्तन अटल सत्य है जो सबके जीवन में होना है। कुछ दिन पहले जिंदगी अलग थी, अब अलग है उसके मिजाज भी अलग हैं। किसी को समझाने का प्रयास व्यर्थ है क्योंकि बड़े पंडित जी कहते हैं कि- 'पापोदय में नहीं सहाय का निमित्त बने कोई' जब आपके पाप कर्म का उदय चल रहा हो तो कोई सहायता भी नहीं करता और जब सामने वाले को पता हो, दुनिया को पता हो कि आपका कठिन समय चल रहा है तब तो और भी दुखद है ये राणा जी ने कहा था। कभी-कभी आप जिसे सबसे ज्यादा चाहते हैं, सोचते हैं कि नहीं ये नहीं बदलेगा। वक्त के साथ वो भी बदल जाते हैं। और उस बदलने से निराश-हताश ना होकर बस नियति का फेरबदल देखना चाहिए। वक...

खामोश रातें, उदास आंखे क्या कहती हैं.....

उतार-चढ़ाव जिंदगी का हिस्सा हैं उन्हें स्वीकारना ही समझदारी है। इन शब्दों के मायने शब्दशः अब समझ में आए हैं। फिलहाल ख्वाबों का खंजर सीने को चीर रहा है। कुछ चीजें बदल रही हैं बदलेंगी लेकिन बहुत कुछ बदलना है पर सब्र का बांध टूट रहा है। कितनी किसकी इज्जत करनी पड़े, अपमान कब तक और कितना सहा जाए। विचारों का अंतर्द्वंद्व अजीब सी मिसमिसाहट भरे आंखों ने नीचे और भी गड्ढे कर रहा है। कुछ चीजें कभी बदलती नहीं हैं जैसे कि लोगों की आपके प्रति सोच....उन्हें लगता है कि तुम वही  पहले जैसे हों, आप विरोध करो तो बेइज्जत होते हैं और उस समय आपको पता चलता है कि कोई आपके साथ नहीं हैं बस अब तमाशबीन बनकर आपका तमाशा बनते देख रहे हैं। बस वो समय होता है जब आपको सब्र सीखना होता है क्योंकि कभी- कभी जवाब मुंह से नहीं दिए जाते है, आपकी मेहनत जवाब देती है वो भी बहुत जोर से...... ये चीजें इसलिए समझ आईं क्योंकि उस वक्त मैंने सब्र किया, गुस्से को कंट्रोल किया और पूरा जोर आंसुओं को रोकने में लगाया  तब जाकर समझ आया कि दार्शनिक बातें कहने-सुनने में कितनी अच्छी लगती हैं लेकिन अपनाने में, अपने कैरेक्टर में ...

वो जो इस सफ़र में जरुरी हैं

                                        परिंदे डरने लगें, अगर परवाज़   से। फिर उन्हें कौन रूबरू कराएगा आज़ से।   “सोमू”                          वो जो इस सफ़र में जरुरी हैं ये महज एक किताब नहीं है। ये एक सपना था जो अब हकीकत बनकर सामने आया है। कई रातों से, कई रातों तक के सफर में, कई अनकही बातों से निकली ये कहानी, शायद मेरी उड़ान को उड़ान दे। शब्दों को किताब की शक्ल मिलना मतलब मेरे सपने का सच होना है। बेहद आभार हमारे बड़े सर गुप्ता जी का जिन्होंने हिंदी का पहला चांटा लगाया था और कहानी कहने का और लिखने का अंदाज़ उन्हीं से सीखा था। सर्वप्रथम इस किताब को छपने से पहले ही सराहना देने वाले मेरे गुरु, बड़े भैया पीयूष शास्त्री को धन्यवाद जिन्होंने हमें नोवेल्स प ढ़ ने की रुचि लगाई और मुझे वा किफ कराया कि मेरी रुचि साहित्य में है। ब्रम्हानंद जी, जिनका साथ हमेशा मेरे साथ रहा। मुझे हॉस्टल में रहते हुए दस साल हो गए हैं। ...

मेरी उड़ान के जीवित पंख थे 'संजीव'

बात 2019 के अगस्त शिविर की है। आज से 4 साल पहले मैं नया नवेला लेखक एक महान व्यक्तित्व को अपना नमूना दिखाने अपनी होस्टल जयपुर शिविर में पहुंचा था। तमन्ना थी कि अपना लिखा उस व्यक्तित्व को दिखाऊँ जिससे ही सब कुछ सीखा था। मुझे पता था ये सागर को बूंद, सूरज को दीपक दिखाने जैसा है लेकिन बालक बुद्धि मैं क्या करता ! शिविर में यहां-वहां उनसे टकराया और बोला भी कि भाईसाब मैंने बुक लिखी है आपको देना है कब आ जाऊं आपके पास बुक देने तो उनके मुंह से सहज ही निकलता 'कभी भी ले आना'। विद्यार्थियों के लिए हमेशा उपलब्ध रहने के कारण ही शायद आज सारे विद्यार्थी उनके जाने से टूट चुके हैं। मैंने उनको बच्चों से कभी ये कहते नहीं सुना कि 'मेरे पास टाइम नहीं है' ऐसा व्यक्तित्व जो हमेशा तत्वज्ञान के लिए समर्पित रहा उसका बखान इन चंद शब्दों से नहीं हो सकता। और आखिरकार शिविर की एक शाम मैंने उनको देखा और पहुंच गया उनके पास अपनी किताब लेकर बिना संकोच किये। ये वो पल था जब उन्होंने किताब हाथ में लेकर बार-बार उसे देखा फिर मुझे देखा और कंधे से अपनी तरफ खींचकर शाबाशी दी, वहीं खड़ी संस्कृति भाभी ने भी किताब की सरा...