घर से दूर हॉस्टल में बिताए दिन और समय के साथ बदले संवाद के तरीके ये सभी हमारे जीवन के बेजोड़ अनुभवों का एक हिस्सा हैं। हिमांशु शुक्ल ‘वीरज’ की ‘घर से हॉस्टल तक’ और ‘पत्र से डिजिटल दुनिया’ ऐसी ही अनुभूतियों को शब्दों में पिरोने वाली दो किताबें हैं। एक विद्यार्थी जीवन और हॉस्टल की दुनिया से परिचित कराती है, तो दूसरी पत्रों की दुनिया से लेकर डिजिटल संवाद के दौर तक हुए बदलावों पर विचार करती है। दोनों पुस्तकों के विषय अलग हैं, लेकिन इनके केंद्र में मनुष्य, उसके रिश्ते, भावनाएँ और बदलते समय के बीच अपनी पहचान बनाए रखने की कोशिश है।
‘घर से हॉस्टल तक’ एक विद्यार्थी के जीवन की उस यात्रा को सामने रखती है, जिसमें वह घर के सुरक्षित और बेखौफ माहौल से निकलकर एक नई दुनिया में कदम रखता है। हॉस्टल में पहली बार घर से दूर रहना, नए लोगों के बीच अपनी जगह बनाना, मेस के खाने से जुड़ी शिकायतें, पढ़ाई, असाइनमेंट्स, परीक्षाएँ और दोस्तों के साथ बिताए बेफिक्र पल ये सभी अनुभव पुस्तक को सहज और रिलेटेबल बनाते हैं। हॉस्टल की जिंदगी भी अलग होती है कभी हम घर जाने के लिए दिन गिनते हैं, लेकिन जब हॉस्टल छोड़ने का समय आता है, तो वहीं रुक जाने का मन करता है। शुरुआत में जो लोग अजनबी लगते हैं, वे धीरे-धीरे अपने बन जाते हैं। छोटी-छोटी शरारतें, देर रात की बातचीत और साथ बिताए सामान्य से दिन आगे चलकर जीवन की अनमोल यादें बन जाते हैं। लेखक हिमांशु बताते हैं कि हॉस्टल केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसी दुनिया है जहाँ विद्यार्थी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी निभाना, अपनी समस्याओं का समाधान करना और दूसरों के साथ तालमेल बैठाना सीखता है।
वहीं दूसरी किताब ‘पत्र से डिजिटल दुनिया’ बोलचाल के बदलते स्वरूप और उसके साथ बदलती मानवीय संवेदनाओं को बांधती है। एक समय था जब किसी पत्र का इंतजार अपने आप में एक एहसास होता था। कागज पर लिखे शब्दों में व्यक्ति अपनी भावनाएँ, अपना समय और अपनी आत्मीयता समेट देता था। पत्र पहुँचने में भले ही कई दिन लगते हों, लेकिन उसके आने की खुशी और उसे पढ़ने का अनुभव अलग ही होता था। मगर आज सोशल मीडिया, वीडियो कॉल और टेक्नोलॉजी के दौर में संवाद बहुत तेज और आसान हो गया है। कुछ सेकंड में हम अपनी बात दुनिया के किसी भी कोने तक पहुँचा सकते हैं। लेकिन इस सुविधा के बीच क्या हमने अपनों के लिए समय निकालना कम कर दिया है। डिजिटल संपर्क बढ़ने से जो लोग साथ में हैं उनसे वास्ता घटता जा रहा है। हिमांशु इस बदलाव को कविताओं, क्षणिकाओं और पत्रों के माध्यम से सामने रखते हैं। मोबाइल, रिश्तों की दूरी, खामोशी, इंतजार, बेरोजगार युवा और बदलते समय जैसे विषय पुस्तक को आज के जीवन से जोड़ते हैं।
दोनों पुस्तक की भाषा सहज और संवेदनशील है। ‘घर से हॉस्टल तक’ हमें उन दिनों की याद दिलाती है, जब नए दोस्त धीरे-धीरे परिवार बन जाते थे और ‘पत्र से डिजिटल दुनिया’* हमें उन रिश्तों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है, जो आज तकनीक के सहारे जुड़े तो हैं, लेकिन कभी-कभी भावनात्मक रूप से दूर भी महसूस होते हैं। यदि आपने कभी हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की है, तो पुस्तक के कई प्रसंग आपको अपने पुराने दिनों में लौटा सकते हैं। वहीं, डिजिटल दुनिया से ब्रेक लेकर पत्रों में खोना चाहते हैं तो दूसरी किताब आपको वहां की सैर कराएगी।












