प्रिय निखिल ! तुम्हारी किताब का इंतजार मैंने वैसे ही किया जैसी मैंने अपनी पहली किताब का किया था। हॉस्टल की यादें सच में भावुक कर देती हैं और उन्हीं यादों में खो जाने का एक जरिया तुम्हारी किताब है। इसे मैंने वर्ल्ड फाइल से निकलकर एक किताब बनने तक देखा है और कितनी बार इसे पढ़ा। सच बताऊँ तो जिस सफर से आप खुद आए हो उस सफर के किस्से और सबक आपको सिर्फ भावुक करते हैं बोरियत नहीं देते। तुम्हारी पुस्तक हॉस्टल के दिनों की वो यादें हैं जो आज भी कितने ही समझदार होने के बाद भी एक चेहरे पर हँसी दे जाती है। मुझे खुशी है कि मैं इस किताब का हिस्सा रहा। किताब को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी हॉस्टल में ही हूँ और सारे किस्से मेरे सामने टीवी में चल रहे हों। खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन अपने गाँव और घर की बेफ़िक्र दुनिया से निकलकर हॉस्टल की अनजानी दुनिया में कदम रखना केवल जगह बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। युवा लेखक निखिल जैन का पहला उपन्यास 'ज़िंदगी जंक्शन' इसी हॉस्टल, दोस्ती और जिम्मेदारी की संवेदनशील कहानी है।...
आज के समय में सरकारी नौकरी केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सम्मान, सुरक्षा और उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है। प्रेम शंकर चरड़ाना का उपन्यास 'सरकारी चाय के लिए' इन्हीं सपनों, संघर्षों और भावनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। उपन्यास में अटल, माधवी, अमीश, लोकेश और मारसाब केवल काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के प्रतिनिधि हैं जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपना जीवन खपा देते हैं। यही कारण है कि कहानी का हर दृश्य और हर संवाद बेहद सहज और आत्मीय लगता है और बताता है कि लेखक ने कहानी को लिखने से पहले जिया है फिर जाकर लिखा है। विद्यार्थियों का गाँव से शहर आकर किराए का कमरा ढूँढना, बेहतर कोचिंग की तलाश, सीमित संसाधनों में गुज़ारा करना, परिवार की उम्मीदों का बोझ और हर परीक्षा के बाद परिणाम की बेचैनी ऐसी कई चीजों को उपन्यास बड़ी संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह उन युवाओं की कहानी है जो कोचिंग की गलियों, किराए के कमरों और भीड़भरी लाइब्रेरियों में हर दिन अपने भविष्य को लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जो अकेलेपन से लड़ते हैं, असफलताओं के बाद फिर खड़...