विजयश्री तनवीर का कहानी-संग्रह ‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ रिश्तों के उन हिस्सों को गहराई से सामने लाता है, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल पाते। इन कहानियों में प्रेम है लेकिन केवल प्रेमी-प्रेमिका वाले अर्थ में नहीं, यहाँ प्रेम के साथ अकेलापन, प्रतीक्षा, स्मृतियाँ, असुरक्षाएँ, दूरी और अधूरे रिश्तों की कसक भी है। विजयश्री रिश्तों को किसी निश्चित परिभाषा में बाँधने के बजाय उनकी जटिलता और मानवीय कमजोरियों के साथ प्रस्तुत करती हैं।
कलमकार
कलमकार में आपका स्वागत है। यह ब्लॉग किताबों, वेब सीरीज़, फिल्मों और साहित्य की निष्पक्ष एवं विस्तृत समीक्षाओं को समर्पित है। यदि आप पढ़ने और देखने के लिए बेहतर विकल्प तलाश रहे हैं, तो यहीं थम जाईये।
रिश्तों की अनकही परतों को टटोलती कहानियाँ : अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार | किताबें & सिनेमा
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
प्रेम, दोस्ती और मानवीय संवेदनाओं को समेटे पाँच अफ़साने : बनारसी अफ़साने | किताबें & सिनेमा
प्रियंवदा दीक्षित की बनारसी अफ़साने किताब अपने पाँच अफ़सानों को गाइड बना पाठकों को बनारस की गलियों, घाटों, चाय की दुकानों, और वहाँ के लोगों की भावनाओं से जोड़ देती है। यह केवल कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि बनारस के घाटों के वो अनगिनत किस्से हैं जो बनारस के यथार्थ को बताते हैं। प्रियंवदा की भाषा इतनी सहज, आत्मीय और प्रभावशाली है कि हर दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो उठता है। फिर हर कहानी के अंत में दिया बेजोड़ ज्ञान उस कहानी के सार को बड़ी सुंदरता से कह देता है।
संग्रह की पहली कहानी "अस्सी घाट" दोस्ती, प्रेम और बिछड़ने के दर्द को बेहद संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है। किसी अपने के चले जाने के बाद जीवन बदल तो जाता है, लेकिन सच्चे दोस्त हमें फिर से जीना सिखाते हैं। दूसरी कहानी "नई सड़क" सांप्रदायिक दंगों की भयावहता और राजनीति के कारण सबसे अधिक पीड़ित होने वाले आम और मासूम लोगों की व्यथा को सामने लाती है। "मणिकर्णिका" कहानी थर्ड जेंडर समुदाय के संघर्ष, सामाजिक उपेक्षा और उनके भीतर छिपे दर्द को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है। चौथी कहानी "वी.टी. रोड" अधूरे प्रेम की कसक और जीवन में आगे बढ़ने की आवश्यकता को बड़ी खूबसूरती से व्यक्त करती है। फिर आखिरी कहानी "तुलसी घाट" सच्चे प्रेम और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने के साहस की कहानी है। यह संदेश देती है कि प्रेम तभी पूर्ण होता है जब उसमें विश्वास और साथ निभाने का साहस हो। किताब में बनारस के अफ़साने वहाँ की आध्यात्मिक छाप लिए हुए हैं। वहाँ की आत्मीय संस्कृति हर कहानी में साँस लेती हुई महसूस होती है।
बहरहाल, प्रियंवदा की भाषा सरल, सहज और बिना किसी बनावटीपन के होने से सीधे दिल तक पहुँचती है। हर कहानी अपने भीतर एक अलग संसार समेटे हुए है। कहीं दोस्ती है, कहीं अधूरा प्रेम, कहीं सामाजिक संवेदनाएँ और कहीं जीवन को नए नज़रिए से देखने की प्रेरणा। यदि आप ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं जो आपके दिल को छू जाएँ और बनारस को एक नए नजरिया से देखने के लिए मजबूर कर दे तो बनारसी अफ़साने अवश्य पढ़िए।
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
सपनों की लंबी उड़ान भरने के बाद अपनी जड़ों की ओर वापिस लौटने की कहानी है : मैं अब भी वहीं हूँ |किताबें&सिनेमा
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
एक इन्सानी त्रासदी की कहानी जो खत्म होने के बाद भी भीतर चलती रहती है : चींटी की अर्थी | किताबें & सिनेमा
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
पुरुषों के अनकहे दर्द और ध्वस्त संवेदनाओं को छूकर जाता काव्य-संग्रह : एकांत में रोता पुरुष | किताबें & सिनेमा
कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष' भी ऐसी ही एक किताब है, जो शब्दों से अधिक भावनाओं से संवाद करती है। यह केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पुरुष के उन अनकहे अनुभवों और संवेदनाओं का ज्वालामुखी है जिन्हें समाज अक्सर यह कहकर अनदेखा कर देता है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" लेकिन जब ये ज्वालामुखी फटता है तो सिर्फ आँसुओं के कुछ नहीं निकलता।
लेखक प्रियेष ने अपनी कविताओं के माध्यम से पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, जिम्मेदारियों, अकेलेपन और मौन को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए हैं। हमारा समाज पुरुषों से हमेशा चट्टान की तरह मज़बूत बने रहने की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पुरुष भी प्रेम करते हैं, उन्हें भी पीड़ा होती है, वे भी टूटते हैं और रोते भी हैं बस सबके सामने नहीं, बल्कि एकांत में।
किताब की सादगी और ईमानदारी ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक में मध्यवर्गीय जीवन की जिम्मेदारियाँ, बेरोज़गारी की पीड़ा, टूटते रिश्ते, प्रेम, पिता का संघर्ष, माँ का स्नेह, अकेलापन और जीवन की वास्तविकताओं को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। "पुरुष रोते हैं किन्तु एकांत में", "पुरुष का मौन", "पिता से आलिंगन" और "प्रेम में पड़ा पुरुष" जैसी कविताएँ पाठक को अंदर तक झकझोर देती हैं। लेखक की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो कोई अपना व्यक्ति सामने बैठकर अपने मन की बातें साझा कर रहा हो।
व्यक्तिगत रूप से यह पुस्तक मुझे अत्यंत प्रभावित कर गई। अब तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक नहीं मिली थी जो पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक शोर को इतनी सहजता और गहराई से शब्द दे सके। मेरे विचार से एकांत में रोता पुरुष हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिससे वो किसी भी पुरुष के भीतर छिपी भावनाओं को थोड़ा और गहराई से समझ सकें। समाज में पुरुषों के संघर्ष, उनके मौन और उनके एकांत के दर्द को जिस संवेदनशीलता से शब्द दिए गए हैं, वह सराहनीय है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है।
पुस्तक: एकांत में रोता पुरुष
लेखक: प्रियेष मालवीय
प्रकाशक : हरसिंगार प्रकाशन
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
गाँव, कॉलेज और सपनों के बीच झूलती एक बेहतरीन कहानी : कभी गाँव कभी कॉलज ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा
कुछ किताबें केवल कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक पूरे जीवंत परिवेश को पाठकों के समक्ष रख देती हैं। अगम जैन का पहला उपन्यास "कभी गाँव, कभी कॉलेज" भी ऐसी ही रचना है, जो गाँव और कॉलेज के बीच पसरी उस दुनिया को जीवंत करती है जहाँ सपने हैं, संघर्ष हैं, प्रेम है, दोस्ती है, असफलताएँ हैं और उम्मीदें भी हैं। उपन्यास की बात करें तो कहानी एक ऐसे गाँव से शुरू होती है जहाँ नया कॉलेज खुला है। शिक्षा का मंदिर बनने के बजाय वह धीरे-धीरे व्यापार का केंद्र बनता दिखाई देता है। डीन साहब और चिलोंटाजी जैसे पात्र शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह केवल विवेक, विनय, सुलोचन, चैन सिंह, सुरभि, महिमा, सुनील, राकेश, और चेतक भैया जैसे युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सामाजिक ताने-बाने की कहानी है जहाँ शिक्षा, व्यवस्था और समाज एक-दूसरे से टकराते भी हैं और एक-दूसरे को साथ-साथ भी चलते हैं। कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे मानो लेखक किसी दूर खड़े दर्शक की तरह नहीं, बल्कि उन्हीं गलियों, उन्हीं खेतों और उसी कॉलेज के बरामदों का हिस्सा रहे हों।
लेखक ने व्यंग्य को अपना सबसे प्रभावी हथियार बनाया है। उपन्यास पढ़ते हुए किताब के कई प्रसंग पाठकों को खुलकर हँसाते हैं। जैसे "मास्साहब" की परिभाषा, "भैया" कहने पर सविनय आंदोलन, "मुँहबोली पत्नी" जैसे प्रसंग कहानी को क्लिष्ट नहीं होने देते और इसी का सहारा लेकर लेखक समाज की गंभीर विसंगतियों पर गहरी चोट भी करता है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जो पाठक को कहानी से भटकने नहीं देती। विवेक जैसे संघर्षशील युवा के जीवन में सुरभि जैसी समझदार और पढ़ाकू दोस्त उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरती है। उनकी मित्रता प्रेम से अधिक प्रेरणा बनकर उभरती है। जहाँ उपन्यास शुरू होते ही सोच रहे थे कि विवेक और महिमा इसके नायक हो सकते हैं लेकिन खत्म होते-होते ये कहानी सुरभि और विवेक में समा गई। वही बात कि अंत में वो दो लोग मिलते हैं जो एक दूसरे को ढूँढ भी नहीं रहे होते हैं।
दूसरी ओर विनय का साहित्य के प्रति प्रेम और अपना विद्यालय खोलने का सपना यह दर्शाता है कि हर युवा का लक्ष्य केवल प्रशासनिक सेवा नहीं होता। कोई लेखक बनना चाहता है, कोई शिक्षक, कोई गाँव का सरपंच। सुलोचन का प्रेम और उसका संघर्ष, चैन सिंह का आलस्य और हास्य, महिमा का कॉलेज जीवन, सुनील की आवारागर्दी, राकेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ये सभी पात्र कहानी में रंग भरते हैं। कहानी में शिक्षा के व्यवसायीकरण, ग्रामीण युवाओं की सीमित संभावनाओं, प्रतिभाशाली छात्रों की मजबूरियों, प्रशासनिक उदासीनता और समाज में फैले दिखावे पर भी तीखा प्रहार करता है।
"कभी गाँव कभी कॉलेज" एक ऐसा उपन्यास है जो आपको हँसाता भी है, सोचने पर मजबूर भी करता है और अपने कॉलेज के दिनों तथा गाँव की सोंधी सी यादों में भी ले जाता है। यदि आप ऐसे उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं जिनमें हास्य, व्यंग्य, संवेदना, प्रेम, दोस्ती और ग्रामीण जीवन सब समा गए हों तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पढ़ने की सूची में शामिल होनी चाहिए।
किताब : कभी गाँव कभी कॉलेज
लेखक: अगम जैन (IPS)
प्रकाशन: हिंद युग्म
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
दौड़ती-भागती सी ज़िंदगी में ठहरने जैसा सुकून देती 'मुसाफ़िर कैफे' | किताबें & सिनेमा
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नई वाली हिंदी के लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की बेस्टसेलिंग किताब 'मुसाफ़िर कैफे' पर आधारित यह वेब सीरीज़ किताब की संवेदनाओं को ओटीटी के पर्दे पर खूबसूरती से जीवंत करती है। लाखों दिलों को छू लेने वाली यह केवल एक अधूरी प्रेम कहानी ही नहीं, बल्कि उन युवाओं की जर्नी है जो सपनों, रिश्तों, फाइलों और पहाड़ों के बीच खुद को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। सीरीज़ आपको ये एहसास कराती है कि सपने, सुकून के लिए कितने जरूरी होते हैं।
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मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा
प्रिय निखिल !
तुम्हारी किताब का इंतजार मैंने वैसे ही किया जैसी मैंने अपनी पहली किताब का किया था। हॉस्टल की यादें सच में भावुक कर देती हैं और उन्हीं यादों में खो जाने का एक जरिया तुम्हारी किताब है। इसे मैंने वर्ल्ड फाइल से निकलकर एक किताब बनने तक देखा है और कितनी बार इसे पढ़ा। सच बताऊँ तो जिस सफर से आप खुद आए हो उस सफर के किस्से और सबक आपको सिर्फ भावुक करते हैं बोरियत नहीं देते। तुम्हारी पुस्तक हॉस्टल के दिनों की वो यादें हैं जो आज भी कितने ही समझदार होने के बाद भी एक चेहरे पर हँसी दे जाती है। मुझे खुशी है कि मैं इस किताब का हिस्सा रहा। किताब को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी हॉस्टल में ही हूँ और सारे किस्से मेरे सामने टीवी में चल रहे हों।
खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन
अपने गाँव और घर की बेफ़िक्र दुनिया से निकलकर हॉस्टल की अनजानी दुनिया में कदम रखना केवल जगह बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। युवा लेखक निखिल जैन का पहला उपन्यास 'ज़िंदगी जंक्शन' इसी हॉस्टल, दोस्ती और जिम्मेदारी की संवेदनशील कहानी है। उपन्यास का मुख्य पात्र विवान अपने घर और गाँव को छोड़कर हॉस्टल पहुँचता है। शुरुआत में सब कुछ नया, अनजान और चुनौतीपूर्ण लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वही हॉस्टल उसका दूसरा घर बन जाता है। विवान और उसके दोस्तों के बीच बनने वाले रिश्ते, उनकी शरारतें, संघर्ष, सपने और बिछड़ने का दर्द कहानी को जीवंत बना देते हैं।
निखिल की बेहद सरल, सहज और संवेदनशील भाषा पाठक को कहानी के पात्रों से आसानी से जोड़ देती है। यह उपन्यास पाठक को उन हॉस्टल के कमरों तक ले जाता है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। घर से दूर रहने वाला एक छात्र छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से आत्मनिर्भर बनना सीखता है। अपने कपड़े संभालने से लेकर समय का प्रबंधन करने तक, हर अनुभव उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है। यही छोटे-छोटे संघर्ष आगे चलकर जीवन की बड़ी सीख बन जाते हैं। कहानी कहीं आपको हँसाती है, कहीं भावुक करती है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते जिम्मेदारियों का एहसास भी कराती है।
जब कोई व्यक्ति अपना घर छोड़कर हॉस्टल जाता है तो वह केवल चार दीवारें नहीं छोड़ता, बल्कि अपने गाँव की गलियाँ, बचपन के दोस्त, आँगन, सुबह-शाम की यादें और अनगिनत भावनाएँ भी पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है। जीवन के हर मोड़ पर लिए गए निर्णय हमें नई मंजिलों तक पहुँचाते हैं, लेकिन कुछ यादें हमेशा हमारे साथ चलती रहती हैं। आखिर में 'ज़िंदगी जंक्शन' किताब अपने नाम के मुताबिक बताती है कि जीवन वास्तव में एक जंक्शन की तरह है, जहाँ अलग-अलग मंजिलों की तमाम ट्रेनें आती हैं। हर पड़ाव हमें कुछ नया सिखाकर आगे बढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है यादों का एक खूबसूरत सफर जो बस चेहरे पर मुस्कान और आँखों को नम कर जाता है।
यदि आप कभी घर से दूर हॉस्टल में रहे हैं, तो यह उपन्यास आपको अपनी पुरानी यादों से फिर रूबरू करा देगा। और यदि आपने कभी हॉस्टल का जीवन नहीं जिया, तब भी यह किताब आपको उस दुनिया का ऐसा अनुभव कराएगी मानो आप स्वयं उन कमरों, गलियारों और दोस्तों के बीच मौजूद हों। अगर आप भी स्मृति पटल पर निर्जीव पड़ी यादों का फिर से स्वाद लेना चाहते हैं तो इस किताब का डोज़ जरूर लीजिए।
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
सरकारी नौकरी के सपनों और संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ है 'सरकारी चाय के लिए' | किताबें & सिनेमा
विद्यार्थियों का गाँव से शहर आकर किराए का कमरा ढूँढना, बेहतर कोचिंग की तलाश, सीमित संसाधनों में गुज़ारा करना, परिवार की उम्मीदों का बोझ और हर परीक्षा के बाद परिणाम की बेचैनी ऐसी कई चीजों को उपन्यास बड़ी संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह उन युवाओं की कहानी है जो कोचिंग की गलियों, किराए के कमरों और भीड़भरी लाइब्रेरियों में हर दिन अपने भविष्य को लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जो अकेलेपन से लड़ते हैं, असफलताओं के बाद फिर खड़े होते हैं और उस एक "PDF" में अपना नाम खोजते हैं, जिसके बाद वर्षों का संघर्ष परिवार की खुशियों में बदल जाता है।
पढ़ते-पढ़ते महसूस होता है कि इस सफर में परीक्षाएं देते-देते विद्यार्थी कब आदमी बन जाता है, कब उसके अपने पीछे छूट जाते हैं उसे पता ही नहीं चलता। इस कहानी में प्रेम है, विफलता है, बिछड़न है, उम्मीद है और सबसे बड़ा सवाल भी—क्या सरकारी नौकरी ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है? यही प्रश्न पुस्तक को सामान्य कथा से आगे ले जाकर एक गंभीर सामाजिक विमर्श में बदल देता है। कहानी अपने शीर्षक की तरह पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है कि अंतिम पृष्ठ के बाद भी इसके पात्र और उनके सवाल पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
'सरकारी चाय के लिए' पढ़ते हुए बार-बार एहसास होता है कि कई घरों में सरकारी नौकरी केवल नौकरी नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान पर लगने वाला पूर्ण विराम होती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह हर उस पाठक के दिल तक पहुँचता है जिसने कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा का सपना देखा हो या ऐसे किसी सपने को अपने घर में जीते हुए देखा हो।
लेखक: प्रेम शंकर चरड़ाना
प्रकाशक: पंक्ति प्रकाशन
समीक्षक : सोमिल जैन 'सोमू'
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
कलम क्या-क्या लिखाए
रिश्तों की अनकही परतों को टटोलती कहानियाँ : अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार | किताबें & सिनेमा
विजयश्री तनवीर का कहानी-संग्रह ‘अनुपमा गांगुली का चौथा प्यार’ रिश्तों के उन हिस्सों को गहराई से सामने लाता है, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल...
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कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो किताब के आखिरी पन्ने के साथ समाप्त तो हो जाती हैं लेकिन पाठक के मन में वे बहुत देर तक भीतर कहीं चलत...
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हमारी जिंदगी में कुछ ऐसे पड़ाव आते हैं, जिन्हें पीछे छोड़कर हम आगे तो निकल जाते हैं लेकिन उनसे पूरी तरह अलग नहीं हो पाते। अपना ग...







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