प्रेम पर लिखी गई अधिकांश कहानियाँ अपने पाठकों को किसी सुखद मिलन, बिछड़न या किसी और अंजाम तक ले जाती हैं, लेकिन शिव शंकर झा का उपन्यास ‘ब्रह्म-पत्र’ प्रेम को किसी एक घटना या रिश्ते की सीमा में बाँधने के बजाय उसे मनुष्य के भीतर चलने वाली एक लंबी यात्रा के रूप में देखता है। इस यात्रा का फलसफा अनेक युगों का इंतजार है और इसके साथ ही कुछ अनकहे प्रश्न जीवन भर हमारे साथ चलते हैं।
धार्मिक और मीनाक्षी की कहानी असम के एक पुस्तकालय में हुई मुलाकात से आरंभ होती है। धीरे-धीरे पत्रों में बढ़ती उनकी नजदीकियां केवल आकर्षण की कहानी नहीं रह जाता, बल्कि भावनाओं, परिस्थितियों और जीवन के निर्णयों के बीच उलझता हुआ एक शाश्वत अनुभव बन जाता है। पुस्तक के नाम अनुसार उपन्यास में पत्रों की विशेष भूमिका है। ये पत्र केवल दो व्यक्तियों के बीच संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि उन भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं जिन्हें सामने बैठकर कह पाना हमेशा संभव नहीं होता। प्रेम लिखा नहीं जाता, जिया जाता है जैसे कई संवाद सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
लेखक शिव शंकर झा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे प्रेम को केवल पाने की इच्छा तक सीमित नहीं रखते। उनके प्रेम में धैर्य है, समर्पण है और अपने भीतर झाँकने की क्षमता भी। प्रतीक्षा के साथ-साथ किसी को पा लेने और प्रेम में किसी को आजाद करने का साहस है। कहानी पढ़ते हुए यह विचार बार-बार उभरता है कि किसी व्यक्ति से जुड़ाव कभी-कभी उसके साथ रहने से अधिक, उसकी स्मृतियों और अपने भीतर उसके लिए बनाए गए स्थान में जीवित रहता है। शिव शंकर झा की भाषा सहज, भावपूर्ण और काव्यात्मक है। वे दार्शनिक विचारों को कहानी का बोझ नहीं बनने देते, बल्कि उन्हें पात्रों की अनुभूतियों के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़ते हैं। कुछ प्रसंगों में कथा की गति धीमी पड़ती नजर आती है लेकिन यही ठहराव उपन्यास के भावलोक को समझने का अवसर भी देता है जिसे हाइलाइटर से हाइलाइट करने का मन करता है।
‘ब्रह्म-पत्र’ की खूबी इसके सवालों में है जो कदम-कदम पर लेखक अपने पाठकों से पूछता है। क्या प्रेम को पूर्ण होने के लिए मिलन आवश्यक है? क्या इंतजार भी प्रेम की एक अभिव्यक्ति हो सकती है? क्या अब के बिछड़े लोग किसी ना किसी युग में मिलते हैं ? बहरहाल, यह उपन्यास इन प्रश्नों के सटीक जवाब नहीं देता, बल्कि पाठक को अपनी अनुभूतियों के आधार पर उन्हें समझने की स्वतंत्रता देता है। जो पठक प्रेम, विरह और आत्मचिंतन को एक साथ अनुभव करना चाहते हैं उनके लिए ‘ब्रह्म-पत्र’ एक संवेदनशील और लम्बे समय तक जहन में हलचल करने वाला उपन्यास है।












