कलमकार में आपका स्वागत है। यह ब्लॉग किताबों, वेब सीरीज़, फिल्मों और साहित्य की निष्पक्ष एवं विस्तृत समीक्षाओं को समर्पित है। यदि आप पढ़ने और देखने के लिए बेहतर विकल्प तलाश रहे हैं, तो यहीं थम जाईये।
प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
पुरुषों के अनकहे दर्द और ध्वस्त संवेदनाओं को छूकर जाता काव्य-संग्रह : एकांत में रोता पुरुष | किताबें & सिनेमा
कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष' भी ऐसी ही एक किताब है, जो शब्दों से अधिक भावनाओं से संवाद करती है। यह केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पुरुष के उन अनकहे अनुभवों और संवेदनाओं का ज्वालामुखी है जिन्हें समाज अक्सर यह कहकर अनदेखा कर देता है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" लेकिन जब ये ज्वालामुखी फटता है तो सिर्फ आँसुओं के कुछ नहीं निकलता।
लेखक प्रियेष ने अपनी कविताओं के माध्यम से पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, जिम्मेदारियों, अकेलेपन और मौन को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए हैं। हमारा समाज पुरुषों से हमेशा चट्टान की तरह मज़बूत बने रहने की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पुरुष भी प्रेम करते हैं, उन्हें भी पीड़ा होती है, वे भी टूटते हैं और रोते भी हैं बस सबके सामने नहीं, बल्कि एकांत में।
किताब की सादगी और ईमानदारी ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक में मध्यवर्गीय जीवन की जिम्मेदारियाँ, बेरोज़गारी की पीड़ा, टूटते रिश्ते, प्रेम, पिता का संघर्ष, माँ का स्नेह, अकेलापन और जीवन की वास्तविकताओं को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। "पुरुष रोते हैं किन्तु एकांत में", "पुरुष का मौन", "पिता से आलिंगन" और "प्रेम में पड़ा पुरुष" जैसी कविताएँ पाठक को अंदर तक झकझोर देती हैं। लेखक की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो कोई अपना व्यक्ति सामने बैठकर अपने मन की बातें साझा कर रहा हो।
व्यक्तिगत रूप से यह पुस्तक मुझे अत्यंत प्रभावित कर गई। अब तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक नहीं मिली थी जो पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक शोर को इतनी सहजता और गहराई से शब्द दे सके। मेरे विचार से एकांत में रोता पुरुष हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिससे वो किसी भी पुरुष के भीतर छिपी भावनाओं को थोड़ा और गहराई से समझ सकें। समाज में पुरुषों के संघर्ष, उनके मौन और उनके एकांत के दर्द को जिस संवेदनशीलता से शब्द दिए गए हैं, वह सराहनीय है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है।
पुस्तक: एकांत में रोता पुरुष
लेखक: प्रियेष मालवीय
प्रकाशक : हरसिंगार प्रकाशन
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
गाँव, कॉलेज और सपनों के बीच झूलती एक बेहतरीन कहानी : कभी गाँव कभी कॉलज ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा
कुछ किताबें केवल कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक पूरे जीवंत परिवेश को पाठकों के समक्ष रख देती हैं। अगम जैन का पहला उपन्यास "कभी गाँव, कभी कॉलेज" भी ऐसी ही रचना है, जो गाँव और कॉलेज के बीच पसरी उस दुनिया को जीवंत करती है जहाँ सपने हैं, संघर्ष हैं, प्रेम है, दोस्ती है, असफलताएँ हैं और उम्मीदें भी हैं। उपन्यास की बात करें तो कहानी एक ऐसे गाँव से शुरू होती है जहाँ नया कॉलेज खुला है। शिक्षा का मंदिर बनने के बजाय वह धीरे-धीरे व्यापार का केंद्र बनता दिखाई देता है। डीन साहब और चिलोंटाजी जैसे पात्र शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह केवल विवेक, विनय, सुलोचन, चैन सिंह, सुरभि, महिमा, सुनील, राकेश, और चेतक भैया जैसे युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सामाजिक ताने-बाने की कहानी है जहाँ शिक्षा, व्यवस्था और समाज एक-दूसरे से टकराते भी हैं और एक-दूसरे को साथ-साथ भी चलते हैं। कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे मानो लेखक किसी दूर खड़े दर्शक की तरह नहीं, बल्कि उन्हीं गलियों, उन्हीं खेतों और उसी कॉलेज के बरामदों का हिस्सा रहे हों।
लेखक ने व्यंग्य को अपना सबसे प्रभावी हथियार बनाया है। उपन्यास पढ़ते हुए किताब के कई प्रसंग पाठकों को खुलकर हँसाते हैं। जैसे "मास्साहब" की परिभाषा, "भैया" कहने पर सविनय आंदोलन, "मुँहबोली पत्नी" जैसे प्रसंग कहानी को क्लिष्ट नहीं होने देते और इसी का सहारा लेकर लेखक समाज की गंभीर विसंगतियों पर गहरी चोट भी करता है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जो पाठक को कहानी से भटकने नहीं देती। विवेक जैसे संघर्षशील युवा के जीवन में सुरभि जैसी समझदार और पढ़ाकू दोस्त उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरती है। उनकी मित्रता प्रेम से अधिक प्रेरणा बनकर उभरती है। जहाँ उपन्यास शुरू होते ही सोच रहे थे कि विवेक और महिमा इसके नायक हो सकते हैं लेकिन खत्म होते-होते ये कहानी सुरभि और विवेक में समा गई। वही बात कि अंत में वो दो लोग मिलते हैं जो एक दूसरे को ढूँढ भी नहीं रहे होते हैं।
दूसरी ओर विनय का साहित्य के प्रति प्रेम और अपना विद्यालय खोलने का सपना यह दर्शाता है कि हर युवा का लक्ष्य केवल प्रशासनिक सेवा नहीं होता। कोई लेखक बनना चाहता है, कोई शिक्षक, कोई गाँव का सरपंच। सुलोचन का प्रेम और उसका संघर्ष, चैन सिंह का आलस्य और हास्य, महिमा का कॉलेज जीवन, सुनील की आवारागर्दी, राकेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ये सभी पात्र कहानी में रंग भरते हैं। कहानी में शिक्षा के व्यवसायीकरण, ग्रामीण युवाओं की सीमित संभावनाओं, प्रतिभाशाली छात्रों की मजबूरियों, प्रशासनिक उदासीनता और समाज में फैले दिखावे पर भी तीखा प्रहार करता है।
"कभी गाँव कभी कॉलेज" एक ऐसा उपन्यास है जो आपको हँसाता भी है, सोचने पर मजबूर भी करता है और अपने कॉलेज के दिनों तथा गाँव की सोंधी सी यादों में भी ले जाता है। यदि आप ऐसे उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं जिनमें हास्य, व्यंग्य, संवेदना, प्रेम, दोस्ती और ग्रामीण जीवन सब समा गए हों तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पढ़ने की सूची में शामिल होनी चाहिए।
किताब : कभी गाँव कभी कॉलेज
लेखक: अगम जैन (IPS)
प्रकाशन: हिंद युग्म
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
दौड़ती-भागती सी ज़िंदगी में ठहरने जैसा सुकून देती 'मुसाफ़िर कैफे' | किताबें & सिनेमा
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नई वाली हिंदी के लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की बेस्टसेलिंग किताब 'मुसाफ़िर कैफे' पर आधारित यह वेब सीरीज़ किताब की संवेदनाओं को ओटीटी के पर्दे पर खूबसूरती से जीवंत करती है। लाखों दिलों को छू लेने वाली यह केवल एक अधूरी प्रेम कहानी ही नहीं, बल्कि उन युवाओं की जर्नी है जो सपनों, रिश्तों, फाइलों और पहाड़ों के बीच खुद को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। सीरीज़ आपको ये एहसास कराती है कि सपने, सुकून के लिए कितने जरूरी होते हैं।
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मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा
प्रिय निखिल !
तुम्हारी किताब का इंतजार मैंने वैसे ही किया जैसी मैंने अपनी पहली किताब का किया था। हॉस्टल की यादें सच में भावुक कर देती हैं और उन्हीं यादों में खो जाने का एक जरिया तुम्हारी किताब है। इसे मैंने वर्ल्ड फाइल से निकलकर एक किताब बनने तक देखा है और कितनी बार इसे पढ़ा। सच बताऊँ तो जिस सफर से आप खुद आए हो उस सफर के किस्से और सबक आपको सिर्फ भावुक करते हैं बोरियत नहीं देते। तुम्हारी पुस्तक हॉस्टल के दिनों की वो यादें हैं जो आज भी कितने ही समझदार होने के बाद भी एक चेहरे पर हँसी दे जाती है। मुझे खुशी है कि मैं इस किताब का हिस्सा रहा। किताब को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी हॉस्टल में ही हूँ और सारे किस्से मेरे सामने टीवी में चल रहे हों।
खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन
अपने गाँव और घर की बेफ़िक्र दुनिया से निकलकर हॉस्टल की अनजानी दुनिया में कदम रखना केवल जगह बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। युवा लेखक निखिल जैन का पहला उपन्यास 'ज़िंदगी जंक्शन' इसी हॉस्टल, दोस्ती और जिम्मेदारी की संवेदनशील कहानी है। उपन्यास का मुख्य पात्र विवान अपने घर और गाँव को छोड़कर हॉस्टल पहुँचता है। शुरुआत में सब कुछ नया, अनजान और चुनौतीपूर्ण लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वही हॉस्टल उसका दूसरा घर बन जाता है। विवान और उसके दोस्तों के बीच बनने वाले रिश्ते, उनकी शरारतें, संघर्ष, सपने और बिछड़ने का दर्द कहानी को जीवंत बना देते हैं।
निखिल की बेहद सरल, सहज और संवेदनशील भाषा पाठक को कहानी के पात्रों से आसानी से जोड़ देती है। यह उपन्यास पाठक को उन हॉस्टल के कमरों तक ले जाता है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। घर से दूर रहने वाला एक छात्र छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से आत्मनिर्भर बनना सीखता है। अपने कपड़े संभालने से लेकर समय का प्रबंधन करने तक, हर अनुभव उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है। यही छोटे-छोटे संघर्ष आगे चलकर जीवन की बड़ी सीख बन जाते हैं। कहानी कहीं आपको हँसाती है, कहीं भावुक करती है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते जिम्मेदारियों का एहसास भी कराती है।
जब कोई व्यक्ति अपना घर छोड़कर हॉस्टल जाता है तो वह केवल चार दीवारें नहीं छोड़ता, बल्कि अपने गाँव की गलियाँ, बचपन के दोस्त, आँगन, सुबह-शाम की यादें और अनगिनत भावनाएँ भी पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है। जीवन के हर मोड़ पर लिए गए निर्णय हमें नई मंजिलों तक पहुँचाते हैं, लेकिन कुछ यादें हमेशा हमारे साथ चलती रहती हैं। आखिर में 'ज़िंदगी जंक्शन' किताब अपने नाम के मुताबिक बताती है कि जीवन वास्तव में एक जंक्शन की तरह है, जहाँ अलग-अलग मंजिलों की तमाम ट्रेनें आती हैं। हर पड़ाव हमें कुछ नया सिखाकर आगे बढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है यादों का एक खूबसूरत सफर जो बस चेहरे पर मुस्कान और आँखों को नम कर जाता है।
यदि आप कभी घर से दूर हॉस्टल में रहे हैं, तो यह उपन्यास आपको अपनी पुरानी यादों से फिर रूबरू करा देगा। और यदि आपने कभी हॉस्टल का जीवन नहीं जिया, तब भी यह किताब आपको उस दुनिया का ऐसा अनुभव कराएगी मानो आप स्वयं उन कमरों, गलियारों और दोस्तों के बीच मौजूद हों। अगर आप भी स्मृति पटल पर निर्जीव पड़ी यादों का फिर से स्वाद लेना चाहते हैं तो इस किताब का डोज़ जरूर लीजिए।
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
सरकारी नौकरी के सपनों और संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ है 'सरकारी चाय के लिए' | किताबें & सिनेमा
विद्यार्थियों का गाँव से शहर आकर किराए का कमरा ढूँढना, बेहतर कोचिंग की तलाश, सीमित संसाधनों में गुज़ारा करना, परिवार की उम्मीदों का बोझ और हर परीक्षा के बाद परिणाम की बेचैनी ऐसी कई चीजों को उपन्यास बड़ी संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह उन युवाओं की कहानी है जो कोचिंग की गलियों, किराए के कमरों और भीड़भरी लाइब्रेरियों में हर दिन अपने भविष्य को लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जो अकेलेपन से लड़ते हैं, असफलताओं के बाद फिर खड़े होते हैं और उस एक "PDF" में अपना नाम खोजते हैं, जिसके बाद वर्षों का संघर्ष परिवार की खुशियों में बदल जाता है।
पढ़ते-पढ़ते महसूस होता है कि इस सफर में परीक्षाएं देते-देते विद्यार्थी कब आदमी बन जाता है, कब उसके अपने पीछे छूट जाते हैं उसे पता ही नहीं चलता। इस कहानी में प्रेम है, विफलता है, बिछड़न है, उम्मीद है और सबसे बड़ा सवाल भी—क्या सरकारी नौकरी ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है? यही प्रश्न पुस्तक को सामान्य कथा से आगे ले जाकर एक गंभीर सामाजिक विमर्श में बदल देता है। कहानी अपने शीर्षक की तरह पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है कि अंतिम पृष्ठ के बाद भी इसके पात्र और उनके सवाल पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं।
'सरकारी चाय के लिए' पढ़ते हुए बार-बार एहसास होता है कि कई घरों में सरकारी नौकरी केवल नौकरी नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान पर लगने वाला पूर्ण विराम होती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह हर उस पाठक के दिल तक पहुँचता है जिसने कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा का सपना देखा हो या ऐसे किसी सपने को अपने घर में जीते हुए देखा हो।
लेखक: प्रेम शंकर चरड़ाना
प्रकाशक: पंक्ति प्रकाशन
समीक्षक : सोमिल जैन 'सोमू'
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
वो बड़ी बातें जो पठान को बनाएगी सुपर-डुपर हिट, इन कारणों से पठान करेगी बॉलीवुड पर राज, शाहरुख के सिर पर सजेगा ताज
पिछले दो-चार सालों से बॉलीवुड इंडस्ट्री में सूखा पड़ा हुआ है, वजह ये नहीं कि फिल्में नहीं बन रही वजह यह है कि फिल्में चल नहीं रहीं। कितने विरोध के बाद भी शाहरुख खान की आने वाली फिल्म पठान बॉलीवुड में पड़े अकाल का हल निकालेगी....
लोगों को पठान को लेकर इतना क्रेज बढ़ गया है कि उसकी एडवांस बुकिंग ने अभी तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, KGF, बाहुबली जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में पठान के आगे पानी भरती नज़र आ रही हैं, रिलीज से पहले इस फिल्म ने कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए हैं....चलिए आपको पठान फ़िल्म को लेकर कुछ ऐसी बातें बताते हैं जो पठान को इस साल की सुपर डुपर हिट बनाएंगी......
पहली बड़ी बात यह है कि शाहरुख के लिए लोगों की दीवानगी देखकर मुंबई में बांद्रा स्थित सबसे बड़ा सिंगल स्क्रीन थियेटर ‘गेटी’ अपनी सालों पुरानी परंपरा तोड़ने जा रहा है। ‘गेटी’ में ‘पठान’ का पहला शो सुबह नौ बजे शुरू होगा, और यह अपने आप में रिकॉर्ड होगा....इसके अलावा भी कुछ ऐसे बड़े फैक्ट्स हैं जिससे ‘पठान’ को हिंदी की सबसे अनूठी और बेमिसाल फिल्म साबित होती हैं....
पठान के साथ दूसरी अनूठी बात यह है कि यशराज फिल्म्स की यह स्पाय यूनिवर्स की कटेगरी की फिल्म है जिसका एंड मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स की फिल्मों की तरह ही होगा, जिसमें 2 क्रेडिट सीन दिये जाएंगे, भारत में ऐसा पहली बार होगा....
तीसरी बात पठान में किसी भी हिंदी फिल्मों में अब दिखाये गये एक्शन सीन से बिल्कुल हटकर एक्शन इस फिल्म में दिखाया जायेगा. ‘पठान’ में दर्शकों का दिल धड़काने वाला एक्शन आईमैक्स फॉर्मेट में होगा. कहा जा रहा है भारत में अब तक IMAX FORMAT में फिल्म नहीं बनी है.....
चौथी बात हाल की टेररिज्म थीम वाली तमाम हिंदी फिल्मों में ऐसे किरदार को विलेन के तौर पर दिखाया गया है जिसे कहीं ना कहीं किसी एक खास मजहब का बताया गया है लेकिन ‘पठान’ में आतंकवाद या आतंकवादी को किसी धर्म से जुड़ा हुआ नहीं बताया जायेगा....
पांचवीं बात भी इस फिल्म के लिए काफी अनूठी है। पठान पहली ऐसी फिल्म होगी जिसकी शूटिंग स्पेन के MALLORCA ISLAND पर हुई है, हालांकि इस फिल्म के बाद इस आइसलैंड पर रणबीरश्रद्धा कपूर की फिल्म की शूटिंग की जा रही है.....
गौर करने वाली छटी बात ये भी है कि हिंदी बॉक्स ऑफिस पर देशभक्ति से जुड़ी फिल्में हमेशा से हिट होती हैं। फिल्म पठान में शाहरुख एक भारतीय खुफिया जासूस के रोल में हैं। इसके तहत वह अपनी खुफिया जासूसों पर आईं पिछली फिल्मों टाइगर और वॉर के हीरोज सलमान खान और रितिक रोशन को इसकी आने वाली फिल्मों में साथ लाएंगे। चर्चा तो यह भी है कि पठान में सलमान भी बतौर टाइगर नजर आएंगे....
इसके अलावा बहुत सी खास बातें हैं जिनकी वजह से पठान का हिट होना निश्चित है.. बॉलीवुड के बड़े बड़े सुपरस्टार शाहरुख खान की पठान के सपोर्ट में आ रहे हैं, सुनील शेट्टी करीना कपूर और अब अजय देवगन ने भी पठान की तारीफ की है अजय देवगन ने कहा कि ‘जिस तरह से इस फिल्म की एडवांस बुकिंग हुई है ऐसा पहले किसी फिल्म की नहीं हुई। मैं दिल से बहुत खुश हूं....
आपको क्या लगता है क्या पठान ब्रेक कर पाएगी बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड या जनता शाहरुख को कर देगी आउट ऑफ बॉक्स? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर बताइए
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
पठान ने बड़े पर्दे पर आते ही मचाई ग़दर, हाउस फुल हुए सारे सिनेमाघर, पब्लिक का आ रहा जबरदस्त रिएक्शन, बोले- फुल पैसा वसूल मूवी
खत्म हुआ इंतज़ार आ गई पठान……आज पठान फिल्म सारे सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है।शाहरुख खान के फैंस 4 साल के लंबे समय के बाद शाहरुख खान को बड़े पर्दे पर देखकर बहुत ही खुश हैं। स्पाय यूनिवर्स केटेगरी की इस मूवी में वीएफएक्स कमाल के हैं। मूवी एंटरटेनिंग है और पूरी फिल्म अपने लक्ष्य से भटकती नहीं है बल्कि ऑडियंस को आखिर तक पकड़े रहती है। पठान फैंस की उम्मीदों पर खरी साबित हो रही है, फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने वाले लोग पठान की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं, शाहरुख ने पठान से फैंस के दिल जीतने के साथ बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया है।
बात अब फ़िल्म की स्टोरी की करें तो पठान में शाहरुख खान RAW एजेंट बने हैं। वे देश को बचाने के लिए दुश्मनों से लड़ते दिखे हैं। शाहरुख का फिल्म में अब तक का सबसे अलग और अनोखा अवतार दिख रहा है। वे फुल एक्शन मोड में हैं। शाहरुख ने अपनी बॉडी पर भी काफी मेहनत की है। दीपिका संग शाहरुख की केमिस्ट्री देखने लायक है। जॉन अब्राहम भी फिल्म में लीड रोल में हैं। शाहरुख खान फिल्म में सही कहते हैं कि कुर्सी की पेटी बांध लीजिए मौसम बिगड़ने वाला है, अब दर्शकों ने फिल्म को देखकर यही बोला कि सच में मौसम बिगड़ गया…ऐसी फाड़ू एक्टिंग देखकर लोग दंग रह गए हैं।
वही पठान से पहले सलमान खान की फिल्म किसी का भाई किसी का जान का टीजर भी लॉन्च हुआ है जो एकदम रोंगटे खड़े कर देने वाला है, और पठान फिल्म में सलमान खान का 10 मिनट के कैमियो रोल ने जनता के फुल पैसे वसूल कर लिए… थिएटर्स के मालिक बोल रहे हैं कि ऐसी फिल्में आती रहेंगी तो हम जिंदा रहेंगे। अब बात करते हैं आपकी, पठान फिल्म आपको कैसी लगी यह बात हम तक कमेंट करके पहुंचाइये….
मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव 'दलपतपुर' का रहने वाले हूँ। जगतगुरु रामानंदाचार्य यूनिवर्सिटी जयपुर से शास्त्री (B.A) किया। ग्रेजुएशन के अंतिम दिनों में महज 19 वर्ष की उम्र में ही अपना पहला हिंदी उपन्यास "उड़ान एक परिंदे की' 2019 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के भोपाल परिसर से पत्रकारिता में M.SC (Electronic Media) किया। इस बीच "लाइफ इंस्ट्रूमेंट" किताब का भी संपादन किया। वर्तमान में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जी की सोशल मीडिया टीम में कार्यरत हूँ। फिलहाल लिखने की भूख को शांत करने के लिए kalamkarmp04.blogspot.com नाम से ब्लॉग भी चलाता हूँ।
कलम क्या-क्या लिखाए
प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा
कैलाश मांजू बिश्नोई की कलेक्टर साहिबा सीरीज की दोनों किताबें सिविल सेवा की तैयारी, प्रेम, महत्वाकांक्षा, संघर्ष और जीवन के कठिन ...
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कुछ किताबें केवल कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक पूरे जीवंत परिवेश को पाठकों के समक्ष रख देती हैं। अगम जैन का पहला उपन्यास "कभी गाँव, कभ...
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न ई वाली हिंदी के लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की बेस्टसेलिंग किताब 'मुसाफ़िर कैफे' पर आधारित यह वेब सीरीज़ किताब की संवेदनाओं को...



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