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प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा

कैलाश मांजू बिश्नोई की कलेक्टर साहिबा सीरीज की दोनों किताबें सिविल सेवा की तैयारी, प्रेम, महत्वाकांक्षा, संघर्ष और जीवन के कठिन निर्णयों को एक साथ पिरोने का प्रयास करती है। व्यक्ति की परिस्थिति बदलते ही प्रेम का यूं हुआ अंत आपको झकझोर देता है। कहानी का केंद्र गिरीश और एंजेल दोनों के सपने बड़े हैं और मंजिल भी लगभग एक ही—सिविल सर्विसेज। लेकिन जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता। एंजेल अपने लक्ष्य को हासिल कर IAS अधिकारी बन जाती है, जबकि गिरीश का सफर कहीं अधिक संघर्षपूर्ण हो जाता है। बस यहीं से कहानी केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की कहानी न रहकर प्रेम, महत्वाकांक्षा और परिस्थितियों के बीच फँसे दो व्यक्तियों की कहानी बन जाती है।

पहले भाग में लेखक ने सिविल सेवा की तैयारी की दुनिया को करीब से दिखाने का प्रयास किया है। तैयारी के दौरान आने वाली मुश्किलें और अभ्यर्थियों के मन में चलने वाली उथल-पुथल जैसे प्रसंग पुस्तक को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से जोड़ते हैं। बीच-बीच में दिए गए सुझाव और प्रेरणात्मक विचार भी उपयोगी हैं। पहले भाग में आपको कहानी कम मोटिवेशन का डोज ज्यादा मिलता है। जिससे लेखक की कोशिश यही है कि वह केवल कहानी सुनाना नहीं चाहते, बल्कि अपने पाठकों, खासकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे युवाओं को सकारात्मक संदेश भी देना चाहते हैं।

दूसरे भाग में कहानी बहुत इमोशनल हो जाती है। गिरीश और एंजेल के रिश्ते में आए बदलाव, दूरी, प्रेम, पीड़ा और अधूरेपन को लेखक ने बयाँ किया है। गिरीश के पत्र और उसके मन की भावनाओं का चित्रण इस भाग के संवेदनशील हिस्सों में शामिल है। एंजेल एक ओर उसका करियर और उसकी एंबीशन हैं, दूसरी ओर परिवार, सामाजिक परिस्थितियाँ और निजी रिश्ते। दोनों पुस्तकों में प्रेम के साथ-साथ आत्मसम्मान का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। गिरीश के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपने दर्द को केवल कमजोरी नहीं बनने देता। परिस्थितियाँ उसे तोड़ती हैं, लेकिन वही परिस्थितियाँ उसे अपने जीवन को नए तरीके से देखने की ताकत भी देती हैं। प्रेम में असफलता को अंत मानने के बजाय आत्मनिर्माण में बदलने का यह संदेश पुस्तक का सकारात्मक पक्ष है।

लेखक की भाषा सहज और संवादात्मक है। कई स्थानों पर संवाद, पत्र और भावनात्मक प्रसंग पाठक को कहानी से जोड़ते हैं। शायद इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात इसका अधूरापन है। हर प्रेम कहानी का सुखद अंत हो, यह जरूरी नहीं। कुछ रिश्ते मंजिल तक नहीं पहुँचते, लेकिन वे व्यक्ति को बदल जरूर देते हैं। गिरीश और एंजेल की कहानी भी इसी भाव को सामने लाती है। कभी-कभी किसी को पाना प्रेम नहीं होता, बल्कि उसके साथ बिताया समय, उससे मिली सीख और उसके बाद स्वयं को संभाल लेना भी प्रेम की एक अलग परिभाषा हो सकती है।

बहरहाल कलेक्टर साहिबा के दोनों भाग प्रेम, सपनों, संघर्ष, महत्वाकांक्षा और आत्मसम्मान की एक ऐसी यात्रा प्रस्तुत करते हैं जिसमें पाठक को जीवन में सही निर्णय लेने का जज़्बा पैदा होता है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से रुचिकर हो सकती है जिन्हें प्रेमकथाओं के साथ प्रेरणा और जीवन से जुड़े सबक भी समेटना पसंद हैं। यह सिर्फ कलेक्टर बनने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों के बीच जन्मे प्रेम, प्रेम में मिले दर्द और उस दर्द से खुद को फिर खड़ा करने की कहानी है।


पुस्तक: कलेक्टर साहिबा पार्ट 1-2
लेखक: कैलाश मांजू बिश्नोई
प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस

पुरुषों के अनकहे दर्द और ध्वस्त संवेदनाओं को छूकर जाता काव्य-संग्रह : एकांत में रोता पुरुष | किताबें & सिनेमा



कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष' भी ऐसी ही एक किताब है, जो शब्दों से अधिक भावनाओं से संवाद करती है। यह केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पुरुष के उन अनकहे अनुभवों और संवेदनाओं का ज्वालामुखी है जिन्हें समाज अक्सर यह कहकर अनदेखा कर देता है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" लेकिन जब ये ज्वालामुखी फटता है तो सिर्फ आँसुओं के कुछ नहीं निकलता।

लेखक प्रियेष  ने अपनी कविताओं के माध्यम से पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, जिम्मेदारियों, अकेलेपन और मौन को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए हैं। हमारा समाज पुरुषों से हमेशा चट्टान की तरह मज़बूत बने रहने की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पुरुष भी प्रेम करते हैं, उन्हें भी पीड़ा होती है, वे भी टूटते हैं और रोते भी हैं बस सबके सामने नहीं, बल्कि एकांत में।

किताब की सादगी और ईमानदारी ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक में मध्यवर्गीय जीवन की जिम्मेदारियाँ, बेरोज़गारी की पीड़ा, टूटते रिश्ते, प्रेम, पिता का संघर्ष, माँ का स्नेह, अकेलापन और जीवन की वास्तविकताओं को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। "पुरुष रोते हैं किन्तु एकांत में", "पुरुष का मौन", "पिता से आलिंगन" और "प्रेम में पड़ा पुरुष" जैसी कविताएँ पाठक को अंदर तक झकझोर देती हैं। लेखक की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो कोई अपना व्यक्ति सामने बैठकर अपने मन की बातें साझा कर रहा हो। 

व्यक्तिगत रूप से यह पुस्तक मुझे अत्यंत प्रभावित कर गई। अब तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक नहीं मिली थी जो पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक शोर को इतनी सहजता और गहराई से शब्द दे सके। मेरे विचार से एकांत में रोता पुरुष हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिससे वो किसी भी पुरुष के भीतर छिपी भावनाओं को थोड़ा और गहराई से समझ सकें। समाज में पुरुषों के संघर्ष, उनके मौन और उनके एकांत के दर्द को जिस संवेदनशीलता से शब्द दिए गए हैं, वह सराहनीय है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है।


पुस्तक: एकांत में रोता पुरुष

लेखक: प्रियेष मालवीय

प्रकाशक : हरसिंगार प्रकाशन



गाँव, कॉलेज और सपनों के बीच झूलती एक बेहतरीन कहानी : कभी गाँव कभी कॉलज ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा

 


कुछ किताबें केवल कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक पूरे जीवंत परिवेश को पाठकों के समक्ष रख देती हैं। अगम जैन का पहला उपन्यास "कभी गाँव, कभी कॉलेज" भी ऐसी ही रचना है, जो गाँव और कॉलेज के बीच पसरी उस दुनिया को जीवंत करती है जहाँ सपने हैं, संघर्ष हैं, प्रेम है, दोस्ती है, असफलताएँ हैं और उम्मीदें भी हैं। उपन्यास की बात करें तो कहानी एक ऐसे गाँव से शुरू होती है जहाँ नया कॉलेज खुला है। शिक्षा का मंदिर बनने के बजाय वह धीरे-धीरे व्यापार का केंद्र बनता दिखाई देता है। डीन साहब और चिलोंटाजी जैसे पात्र शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह केवल विवेक, विनय, सुलोचन, चैन सिंह, सुरभि, महिमा, सुनील, राकेश, और चेतक भैया जैसे युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सामाजिक ताने-बाने की कहानी है जहाँ शिक्षा, व्यवस्था और समाज एक-दूसरे से टकराते भी हैं और एक-दूसरे को साथ-साथ भी चलते हैं। कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे मानो लेखक किसी दूर खड़े दर्शक की तरह नहीं, बल्कि उन्हीं गलियों, उन्हीं खेतों और उसी कॉलेज के बरामदों का हिस्सा रहे हों।

लेखक ने व्यंग्य को अपना सबसे प्रभावी हथियार बनाया है। उपन्यास पढ़ते हुए किताब के कई प्रसंग पाठकों को खुलकर हँसाते हैं। जैसे "मास्साहब" की परिभाषा, "भैया" कहने पर सविनय आंदोलन, "मुँहबोली पत्नी" जैसे प्रसंग कहानी को क्लिष्ट नहीं होने देते और इसी का सहारा लेकर लेखक समाज की गंभीर विसंगतियों पर गहरी चोट भी करता है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जो पाठक को कहानी से भटकने नहीं देती। विवेक जैसे संघर्षशील युवा के जीवन में सुरभि जैसी समझदार और पढ़ाकू दोस्त उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरती है। उनकी मित्रता प्रेम से अधिक प्रेरणा बनकर उभरती है। जहाँ उपन्यास शुरू होते ही सोच रहे थे कि विवेक और महिमा इसके नायक हो सकते हैं लेकिन खत्म होते-होते ये कहानी सुरभि और विवेक में समा गई। वही बात कि अंत में वो दो लोग मिलते हैं जो एक दूसरे को ढूँढ भी नहीं रहे होते हैं।

दूसरी ओर विनय का साहित्य के प्रति प्रेम और अपना विद्यालय खोलने का सपना यह दर्शाता है कि हर युवा का लक्ष्य केवल प्रशासनिक सेवा नहीं होता। कोई लेखक बनना चाहता है, कोई शिक्षक, कोई गाँव का सरपंच। सुलोचन का प्रेम और उसका संघर्ष, चैन सिंह का आलस्य और हास्य, महिमा का कॉलेज जीवन, सुनील की आवारागर्दी, राकेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ये सभी पात्र कहानी में रंग भरते हैं। कहानी में शिक्षा के व्यवसायीकरण, ग्रामीण युवाओं की सीमित संभावनाओं, प्रतिभाशाली छात्रों की मजबूरियों, प्रशासनिक उदासीनता और समाज में फैले दिखावे पर भी तीखा प्रहार करता है। 

"कभी गाँव कभी कॉलेज" एक ऐसा उपन्यास है जो आपको हँसाता भी है, सोचने पर मजबूर भी करता है और अपने कॉलेज के दिनों तथा गाँव की सोंधी सी यादों में भी ले जाता है। यदि आप ऐसे उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं जिनमें हास्य, व्यंग्य, संवेदना, प्रेम, दोस्ती और ग्रामीण जीवन सब समा गए हों तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पढ़ने की सूची में शामिल होनी चाहिए।


किताब : कभी गाँव कभी कॉलेज 

लेखक: अगम जैन (IPS)

प्रकाशन: हिंद युग्म




दौड़ती-भागती सी ज़िंदगी में ठहरने जैसा सुकून देती 'मुसाफ़िर कैफे' | किताबें & सिनेमा



ई वाली हिंदी के लोकप्रिय लेखक दिव्य प्रकाश दुबे की बेस्टसेलिंग किताब 'मुसाफ़िर कैफे' पर आधारित यह वेब सीरीज़ किताब की संवेदनाओं को ओटीटी के पर्दे पर खूबसूरती से जीवंत करती है। लाखों दिलों को छू लेने वाली यह केवल एक अधूरी प्रेम कहानी ही नहीं, बल्कि उन युवाओं की जर्नी है जो सपनों, रिश्तों, फाइलों और पहाड़ों के बीच खुद को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। सीरीज़ आपको ये एहसास कराती है कि सपने, सुकून के लिए कितने जरूरी होते हैं। 


अधूरे प्रेम, तलाश और आत्मखोज की खूबसूरत यात्रा

कहानी चंदर, सुधा और प्रीति के दरमियाँ घूमती है। चंदर जो पेशे से इंजीनियर है, जिसे अमेरिका में सुकून नहीं मिला तो अपना करियर छोड़कर भोपाल लौट आता है। माँ की जिद के कारण वह सुधा से मिलता है, जो एक डिवोर्स लॉयर है। सुधा की शादी में कोई दिलचस्पी नहीं रहती वह अपने सपने को पूरा करने पर ध्यान देती है। फिर एक ऐसी घटना घटती है जो दोनों की जिंदगी में एक नया मोड़ ले लेती है। चंदर मसूरी चला जाता है, जहाँ वह एक कैफे खोलता है और प्रीति के साथ जिंदगी का एक नया चैप्टर शुरू करता है। फिर एक दिन सुधा वापिस आती है और कहानी कहीं पहाड़ों में खो जाती है। दोस्ती, प्रेम, बिछड़न, सपने, एंबीशन, उम्मीद और लंबा इंतज़ार जैसे हर इमोशन कहानी का हिस्सा बनकर दर्शकों के मन में सहज रूप से उतरते हैं। कई बार लगता है कि हर मुसाफ़िर की अपनी मंज़िल तो होती है, लेकिन सफ़र के दौरान उसके सपने इवॉल्व होते रहते हैं। पहाड़ों की खूबसूरती, कैफ़े का शांत वातावरण, प्रोमिस वॉल और बैकग्राउंड में चलता म्यूजिक कहानी को रोचक बना देते हैं। सीरीज के  कुछ सीन्स लंबे समय तक याद रह जाते हैं, जैसे वो पल जब सालों बाद चंदर पहली बार मुसाफ़िर कैफे में सुधा को देखता है। 

एक्टिंग, डायरेक्शन और लेखन का जबरदस्त कॉकटेल

निर्देशक रुचिर अरुण ने उपन्यास की आत्मा को बरकरार रखते हुए कहानी को सहज और प्रवाहपूर्ण रखा है। कोई भी किरदार और कैमरा एंगल आपको निराश नहीं करेगा। शारण्या राजगोपाल ने संवादो को इतनी खूबसूरती से पिरोया है कि संवाद बनावटी नहीं लगते, बल्कि किरदारों की भावनाओं को स्वाभाविक ढंग से सामने लाते हैं, जो दर्शकों को कहानी से भटकने नहीं देते। एक्टिंग की बात करें तो सीरीज देखते वक्त ऐसा लगता है जैसे सभी कलाकारों ने अपने-अपने किरदार खुद के अंदर उतार लिए हों। वो किरदार जो अभी तक किताब में कैद थे, पाठकों की कल्पना के अनुसार पर्दे पर उठ खड़े हुए हों। चंदर के रूप में विक्रांत मैसी, सुधा के रूप में वेदिका पिंटो और प्रीति कौशिक के रूप में महिमा मकवाना ने अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी से निभाकर उनमें जान फूँकी साथ ही सीरीज के अन्य एक्टर आदिल हुसैन, राजीव सिद्धार्थ, अनुभा फतेहपुरिया, सादिया सिद्दीकी और लवलीन मिश्रा ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।

क्यों देखें

मुसाफ़िर कैफे उन दर्शकों के लिए एक बेहतरीन अनुभव है जो शोर-शराबे और मसालेदार मनोरंजन से हटकर, दिल को छू लेने वाली कहानियाँ देखना पसंद करते हैं। यदि आप भागदौड़ भरी ज़िंदगी में कुछ पल ठहरकर सुकून महसूस करना चाहते हैं, तो यह वेब सीरीज़ आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाएगी जहाँ प्रेम, सपने, अकेलापन, उम्मीद और खुद की तलाश का एक मिश्रण हो। अगर आपको ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जो खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके साथ चलती रहें, तो मुसाफ़िर कैफे ज़रूर देखिए।

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वेब सीरीज़ :  मुसाफ़िर कैफे
कलाकार : विक्रांत मैसी, वेदिका पिंटो, महिमा मकवाना, आदिल हुसैन, राजीव सिद्धार्थ, अनुभा फतेहपुरिया, सादिया सिद्दीकी, लवलीन मिश्रा
लेखक : शारण्या राजगोपाल (दिव्य प्रकाश दुबे के उपन्यास मुसाफ़िर कैफे पर आधारित)
निर्देशक: रुचिर अरुण
OTT : नेटफ्लिक्स
रिलीज : 24 जुलाई 2026
विधा: रोमांस | ड्रामा |



खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा


प्रिय निखिल !

तुम्हारी किताब का इंतजार मैंने वैसे ही किया जैसी मैंने अपनी पहली किताब का किया था। हॉस्टल की यादें सच में भावुक कर देती हैं और उन्हीं यादों में खो जाने का एक जरिया तुम्हारी किताब है। इसे मैंने वर्ल्ड फाइल से निकलकर एक किताब बनने तक देखा है और कितनी बार इसे पढ़ा। सच बताऊँ तो जिस सफर से आप खुद आए हो उस सफर के किस्से और सबक आपको सिर्फ भावुक करते हैं बोरियत नहीं देते। तुम्हारी पुस्तक हॉस्टल के दिनों की वो यादें हैं जो आज भी कितने ही समझदार होने के बाद भी एक चेहरे पर हँसी दे जाती है। मुझे खुशी है कि मैं इस किताब का हिस्सा रहा। किताब को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी हॉस्टल में ही हूँ और सारे किस्से मेरे सामने टीवी में चल रहे हों।


खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन

अपने गाँव और घर की बेफ़िक्र दुनिया से निकलकर हॉस्टल की अनजानी दुनिया में कदम रखना केवल जगह बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। युवा लेखक निखिल जैन का पहला उपन्यास 'ज़िंदगी जंक्शन' इसी हॉस्टल, दोस्ती और जिम्मेदारी की संवेदनशील कहानी है। उपन्यास का मुख्य पात्र विवान अपने घर और गाँव को छोड़कर हॉस्टल पहुँचता है। शुरुआत में सब कुछ नया, अनजान और चुनौतीपूर्ण लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वही हॉस्टल उसका दूसरा घर बन जाता है। विवान और उसके दोस्तों के बीच बनने वाले रिश्ते, उनकी शरारतें, संघर्ष, सपने और बिछड़ने का दर्द कहानी को जीवंत बना देते हैं।

निखिल की बेहद सरल, सहज और संवेदनशील भाषा पाठक को कहानी के पात्रों से आसानी से जोड़ देती है। यह उपन्यास पाठक को उन हॉस्टल के कमरों तक ले जाता है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। घर से दूर रहने वाला एक छात्र छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से आत्मनिर्भर बनना सीखता है। अपने कपड़े संभालने से लेकर समय का प्रबंधन करने तक, हर अनुभव उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है। यही छोटे-छोटे संघर्ष आगे चलकर जीवन की बड़ी सीख बन जाते हैं। कहानी कहीं आपको हँसाती है, कहीं भावुक करती है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते जिम्मेदारियों का एहसास भी कराती है।

जब कोई व्यक्ति अपना घर छोड़कर हॉस्टल जाता है तो वह केवल चार दीवारें नहीं छोड़ता, बल्कि अपने गाँव की गलियाँ, बचपन के दोस्त, आँगन, सुबह-शाम की यादें और अनगिनत भावनाएँ भी पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है। जीवन के हर मोड़ पर लिए गए निर्णय हमें नई मंजिलों तक पहुँचाते हैं, लेकिन कुछ यादें हमेशा हमारे साथ चलती रहती हैं। आखिर में 'ज़िंदगी जंक्शन' किताब अपने नाम के मुताबिक बताती है कि जीवन वास्तव में एक जंक्शन की तरह है, जहाँ अलग-अलग मंजिलों की तमाम ट्रेनें आती हैं। हर पड़ाव हमें कुछ नया सिखाकर आगे बढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है यादों का एक खूबसूरत सफर जो बस चेहरे पर मुस्कान और आँखों को नम कर जाता है।

यदि आप कभी घर से दूर हॉस्टल में रहे हैं, तो यह उपन्यास आपको अपनी पुरानी यादों से फिर रूबरू करा देगा। और यदि आपने कभी हॉस्टल का जीवन नहीं जिया, तब भी यह किताब आपको उस दुनिया का ऐसा अनुभव कराएगी मानो आप स्वयं उन कमरों, गलियारों और दोस्तों के बीच मौजूद हों। अगर आप भी स्मृति पटल पर निर्जीव पड़ी यादों का फिर से स्वाद लेना चाहते हैं तो इस किताब का डोज़ जरूर लीजिए।





सरकारी नौकरी के सपनों और संघर्ष का सजीव दस्तावेज़ है 'सरकारी चाय के लिए' | किताबें & सिनेमा

 


आज के समय में सरकारी नौकरी केवल एक रोजगार नहीं, बल्कि लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सम्मान, सुरक्षा और उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है। प्रेम शंकर चरड़ाना का उपन्यास 'सरकारी चाय के लिए' इन्हीं सपनों, संघर्षों और भावनाओं का सजीव दस्तावेज़ है। उपन्यास में अटल, माधवी, अमीश, लोकेश और मारसाब केवल काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के प्रतिनिधि हैं जो वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में अपना जीवन खपा देते हैं। यही कारण है कि कहानी का हर दृश्य और हर संवाद बेहद सहज और आत्मीय लगता है और बताता है कि लेखक ने कहानी को लिखने से पहले जिया है फिर जाकर लिखा है।

विद्यार्थियों का गाँव से शहर आकर किराए का कमरा ढूँढना, बेहतर कोचिंग की तलाश, सीमित संसाधनों में गुज़ारा करना, परिवार की उम्मीदों का बोझ और हर परीक्षा के बाद परिणाम की बेचैनी ऐसी कई चीजों को उपन्यास बड़ी संवेदनशीलता से सामने लाता है। यह उन युवाओं की कहानी है जो कोचिंग की गलियों, किराए के कमरों और भीड़भरी लाइब्रेरियों में हर दिन अपने भविष्य को लिखने की कोशिश कर रहे हैं। जो अकेलेपन से लड़ते हैं, असफलताओं के बाद फिर खड़े होते हैं और उस एक "PDF" में अपना नाम खोजते हैं, जिसके बाद वर्षों का संघर्ष परिवार की खुशियों में बदल जाता है।

पढ़ते-पढ़ते महसूस होता है कि इस सफर में परीक्षाएं देते-देते विद्यार्थी कब आदमी बन जाता है, कब उसके अपने पीछे छूट जाते हैं उसे पता ही नहीं चलता। इस कहानी में प्रेम है, विफलता है, बिछड़न है, उम्मीद है और सबसे बड़ा सवाल भी—क्या सरकारी नौकरी ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है? यही प्रश्न पुस्तक को सामान्य कथा से आगे ले जाकर एक गंभीर सामाजिक विमर्श में बदल देता है। कहानी अपने शीर्षक की तरह पाठक को अंत तक बाँधे रखती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत है कि अंतिम पृष्ठ के बाद भी इसके पात्र और उनके सवाल पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

'सरकारी चाय के लिए' पढ़ते हुए बार-बार एहसास होता है कि कई घरों में सरकारी नौकरी केवल नौकरी नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार के वर्षों के संघर्ष, त्याग और आत्मसम्मान पर लगने वाला पूर्ण विराम होती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि यह हर उस पाठक के दिल तक पहुँचता है जिसने कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा का सपना देखा हो या ऐसे किसी सपने को अपने घर में जीते हुए देखा हो।

किताब: सरकारी चाय के लिए
लेखक: प्रेम शंकर चरड़ाना
प्रकाशक: पंक्ति प्रकाशन
समीक्षक : सोमिल जैन 'सोमू'



वो बड़ी बातें जो पठान को बनाएगी सुपर-डुपर हिट, इन कारणों से पठान करेगी बॉलीवुड पर राज, शाहरुख के सिर पर सजेगा ताज


पिछले दो-चार सालों से बॉलीवुड इंडस्ट्री में सूखा पड़ा हुआ है, वजह ये नहीं कि फिल्में नहीं बन रही वजह यह है कि फिल्में चल नहीं रहीं। कितने विरोध के बाद भी शाहरुख खान की आने वाली फिल्म पठान बॉलीवुड में पड़े अकाल का हल निकालेगी.... 

लोगों को पठान को लेकर इतना क्रेज बढ़ गया है कि उसकी एडवांस बुकिंग ने अभी तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं, KGF, बाहुबली जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में पठान के आगे पानी भरती नज़र आ रही हैं, रिलीज से पहले इस फिल्म ने कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए हैं....चलिए आपको पठान फ़िल्म को लेकर कुछ ऐसी बातें बताते हैं जो पठान को इस साल की सुपर डुपर हिट बनाएंगी......


पहली बड़ी बात यह है कि शाहरुख के लिए लोगों की दीवानगी देखकर मुंबई में बांद्रा स्थित सबसे बड़ा सिंगल स्क्रीन थियेटर ‘गेटी’ अपनी सालों पुरानी परंपरा तोड़ने जा रहा है। ‘गेटी’ में ‘पठान’ का पहला शो सुबह नौ बजे शुरू होगा, और यह अपने आप में रिकॉर्ड होगा....इसके अलावा भी कुछ ऐसे बड़े फैक्ट्स हैं जिससे ‘पठान’ को हिंदी की सबसे अनूठी और बेमिसाल फिल्म साबित होती हैं....


पठान के साथ दूसरी अनूठी बात यह है कि यशराज फिल्म्स की यह स्पाय यूनिवर्स की कटेगरी की फिल्म है जिसका एंड मार्वल सिनेमैटिक यूनिवर्स की फिल्मों की तरह ही होगा, जिसमें 2 क्रेडिट सीन दिये जाएंगे, भारत में ऐसा पहली बार होगा....

तीसरी बात पठान में किसी भी हिंदी फिल्मों में अब दिखाये गये एक्शन सीन से बिल्कुल हटकर एक्शन इस फिल्म में दिखाया जायेगा. ‘पठान’ में दर्शकों का दिल धड़काने वाला एक्शन आईमैक्स फॉर्मेट में होगा. कहा जा रहा है भारत में अब तक IMAX FORMAT में फिल्म नहीं बनी है.....

चौथी बात हाल की टेररिज्म थीम वाली तमाम हिंदी फिल्मों में ऐसे किरदार को विलेन के तौर पर दिखाया गया है जिसे कहीं ना कहीं किसी एक खास मजहब का बताया गया है लेकिन ‘पठान’ में आतंकवाद या आतंकवादी को किसी धर्म से जुड़ा हुआ नहीं बताया जायेगा....

पांचवीं बात भी इस फिल्म के लिए काफी अनूठी है। पठान पहली ऐसी फिल्म होगी जिसकी शूटिंग स्पेन के MALLORCA ISLAND पर हुई है, हालांकि इस फिल्म के बाद इस आइसलैंड पर रणबीरश्रद्धा कपूर की फिल्म की शूटिंग की जा रही है.....

गौर करने वाली छटी बात ये भी है कि हिंदी बॉक्स ऑफिस पर देशभक्ति से जुड़ी फिल्में हमेशा से हिट होती हैं। फिल्म पठान में शाहरुख एक भारतीय खुफिया जासूस के रोल में हैं। इसके तहत वह अपनी खुफिया जासूसों पर आईं पिछली फिल्मों टाइगर और वॉर के हीरोज सलमान खान और रितिक रोशन को इसकी आने वाली फिल्मों में साथ लाएंगे। चर्चा तो यह भी है कि पठान में सलमान भी बतौर टाइगर नजर आएंगे....

इसके अलावा बहुत सी खास बातें हैं जिनकी वजह से पठान का हिट होना निश्चित है.. बॉलीवुड के बड़े बड़े सुपरस्टार शाहरुख खान की पठान के सपोर्ट में आ रहे हैं, सुनील शेट्टी करीना कपूर और अब अजय देवगन ने भी पठान की तारीफ की है अजय देवगन ने कहा कि  ‘जिस तरह से इस फिल्म की एडवांस बुकिंग हुई है ऐसा पहले किसी फिल्म की नहीं हुई। मैं दिल से बहुत खुश हूं....

आपको क्या लगता है क्या पठान ब्रेक कर पाएगी बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड या जनता शाहरुख को कर देगी आउट ऑफ बॉक्स? अपनी राय कमेंट सेक्शन में जरूर बताइए

पठान ने बड़े पर्दे पर आते ही मचाई ग़दर, हाउस फुल हुए सारे सिनेमाघर, पब्लिक का आ रहा जबरदस्त रिएक्शन, बोले- फुल पैसा वसूल मूवी

खत्म हुआ इंतज़ार आ गई पठान……आज पठान फिल्म सारे सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है।शाहरुख खान के फैंस 4 साल के लंबे समय के बाद शाहरुख खान को बड़े पर्दे पर देखकर बहुत ही खुश हैं। स्पाय यूनिवर्स केटेगरी की इस मूवी में वीएफएक्स कमाल के हैं। मूवी एंटरटेनिंग है और पूरी फिल्म अपने लक्ष्य से भटकती नहीं है बल्कि ऑडियंस को आखिर तक पकड़े रहती है। पठान फैंस की उम्मीदों पर खरी साबित हो रही है, फिल्म का फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने वाले लोग पठान की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं, शाहरुख ने पठान से फैंस के दिल जीतने के साथ बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया है।

बात अब फ़िल्म की स्टोरी की करें तो पठान में शाहरुख खान RAW एजेंट बने हैं। वे देश को बचाने के लिए दुश्मनों से लड़ते दिखे हैं। शाहरुख का फिल्म में अब तक का सबसे अलग और अनोखा अवतार दिख रहा है। वे फुल एक्शन मोड में हैं। शाहरुख ने अपनी बॉडी पर भी काफी मेहनत की है। दीपिका संग शाहरुख की केमिस्ट्री देखने लायक है। जॉन अब्राहम भी फिल्म में लीड रोल में हैं। शाहरुख खान फिल्म में सही कहते हैं कि कुर्सी की पेटी बांध लीजिए मौसम बिगड़ने वाला है, अब दर्शकों ने फिल्म को देखकर यही बोला कि सच में मौसम बिगड़ गया…ऐसी फाड़ू एक्टिंग देखकर लोग दंग रह गए हैं।

वही पठान से पहले सलमान खान की फिल्म किसी का भाई किसी का जान का टीजर भी लॉन्च हुआ है जो एकदम रोंगटे खड़े कर देने वाला है, और पठान फिल्म में सलमान खान का 10 मिनट के कैमियो रोल ने जनता के फुल पैसे वसूल कर लिए… थिएटर्स के मालिक बोल रहे हैं कि ऐसी फिल्में आती रहेंगी तो हम जिंदा रहेंगे। अब बात करते हैं आपकी, पठान फिल्म आपको कैसी लगी यह बात हम तक कमेंट करके पहुंचाइये….

कलम क्या-क्या लिखाए

प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा

कैलाश मांजू बिश्नोई की कलेक्टर साहिबा सीरीज की दोनों किताबें सिविल सेवा की तैयारी, प्रेम, महत्वाकांक्षा, संघर्ष और जीवन के कठिन ...