कुछ किताबें पढ़ते-पढ़ते आप भावुक हो जाते हैं, उसमें लिखे हर शब्द को आप महसूस कर रहे होते हैं। प्रियेष मालवीय की 'एकांत में रोता पुरुष' भी ऐसी ही एक किताब है, जो शब्दों से अधिक भावनाओं से संवाद करती है। यह केवल एक काव्य-संग्रह नहीं, बल्कि पुरुष के उन अनकहे अनुभवों और संवेदनाओं का ज्वालामुखी है जिन्हें समाज अक्सर यह कहकर अनदेखा कर देता है कि "मर्द को दर्द नहीं होता" लेकिन जब ये ज्वालामुखी फटता है तो सिर्फ आँसुओं के कुछ नहीं निकलता।
लेखक प्रियेष ने अपनी कविताओं के माध्यम से पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक संघर्ष, प्रेम, जिम्मेदारियों, अकेलेपन और मौन को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ शब्द दिए हैं। हमारा समाज पुरुषों से हमेशा चट्टान की तरह मज़बूत बने रहने की अपेक्षा करता है, जबकि वास्तविकता यह है कि पुरुष भी प्रेम करते हैं, उन्हें भी पीड़ा होती है, वे भी टूटते हैं और रोते भी हैं बस सबके सामने नहीं, बल्कि एकांत में।
किताब की सादगी और ईमानदारी ही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। पुस्तक में मध्यवर्गीय जीवन की जिम्मेदारियाँ, बेरोज़गारी की पीड़ा, टूटते रिश्ते, प्रेम, पिता का संघर्ष, माँ का स्नेह, अकेलापन और जीवन की वास्तविकताओं को बेहद सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है। "पुरुष रोते हैं किन्तु एकांत में", "पुरुष का मौन", "पिता से आलिंगन" और "प्रेम में पड़ा पुरुष" जैसी कविताएँ पाठक को अंदर तक झकझोर देती हैं। लेखक की भाषा सरल, सहज और आत्मीय है। पढ़ते समय ऐसा महसूस होता है मानो कोई अपना व्यक्ति सामने बैठकर अपने मन की बातें साझा कर रहा हो।
व्यक्तिगत रूप से यह पुस्तक मुझे अत्यंत प्रभावित कर गई। अब तक मुझे ऐसी कोई पुस्तक नहीं मिली थी जो पुरुषों के भीतर चल रहे भावनात्मक शोर को इतनी सहजता और गहराई से शब्द दे सके। मेरे विचार से एकांत में रोता पुरुष हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए जिससे वो किसी भी पुरुष के भीतर छिपी भावनाओं को थोड़ा और गहराई से समझ सकें। समाज में पुरुषों के संघर्ष, उनके मौन और उनके एकांत के दर्द को जिस संवेदनशीलता से शब्द दिए गए हैं, वह सराहनीय है। यह एक ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि लंबे समय तक महसूस किया जाता है।
पुस्तक: एकांत में रोता पुरुष
लेखक: प्रियेष मालवीय
प्रकाशक : हरसिंगार प्रकाशन


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