रिश्तों की जकड़न से खुद को खोने से बचाने की कहानी है : बेहया | किताबें & सिनेमा

 


विनीता अस्थाना का उपन्यास ‘बेहया’ स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को लेकर समाज से कई पेचीदा और जरूरी सवाल करता है। एक स्त्री की निजी जिंदगी और रिश्तों में टकराव जिसे सिर्फ वो स्त्री जानती है, उसका सरल भाषा में सटीक वर्णन किया गया है। यह केवल घरेलू हिंसा या दांपत्य संबंधों की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष की आपबीती है जिसमें एक महिला अपने अस्तित्व और सम्मान को बचाने के लिए खुद से भी सवाल करती है। 

उपन्यास की मुख्य पात्र सिया एक सफल, आत्मनिर्भर और संवेदनशील महिला है। अपने प्रोफेशनल जीवन में वह आज की नारी की तरह आत्मविश्वास से भरी है, लेकिन निजी जीवन में परिस्थितियाँ उसके बिल्कुल उलट हैं। उसका पति यश आर्थिक रूप से संपन्न होने के बावजूद अपनी निम्न मानसिकता और असुरक्षा से बाहर नहीं निकल पाता। सिया की सफलता और स्वतंत्र व्यक्तित्व उसके लिए सहज नहीं हैं। इसी बीच अभिज्ञान सिया के जीवन में आता है। उसका किरदार केवल प्रेम के एक नए विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि सिया को अपने भीतर झांकने और अपने फैसलों पर विचार करने का अवसर देने वाले व्यक्ति के रूप में सामने आता है। सिया उससे मिलकर समझने लगती है कि सेल्फ रिस्पेक्ट  कुचलकर जिंदगी जीना जिंदगी नहीं है। यहाँ शुरू होती है एक प्लोटोनिक प्रेम कहानी जो अपने आप में अलग और बेहतरीन है।

विनीता ने पूरी कहानी में बौद्धिक ज्ञान देने की बजाय कहानी को उनके पात्रों के जरिए पाठकों को सोचने के लिए मजबूर किया। एक खासियत यह भी है कि विनीता कहानी को एकतरफा नहीं बनातीं। स्त्री के साथ होने वाले मानसिक शोषण और सामाजिक दबाव के साथ पुरुष के भीतर मौजूद असुरक्षा और भावनात्मक संघर्ष को भी समझने की कोशिश की गई है। इस तरह कहानी के सभी पात्र अपनी कमजोरियों और परिस्थितियों के साथ सामने आते हैं। 

‘बेहया’ शीर्षक भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण सवाल है। समाज अक्सर अपने लिए फैसले लेने वाली और स्वतंत्र स्त्री को ना जाने कैसे-कैसे नामों से पुकारता है। उसमें एक विशेषण बेहया भी है। विनीता अस्थाना की भाषा सहज और प्रवाहपूर्ण है। जब यह किताब पढ़ना शुरू करते हैं तो बस पढ़ते ही जाते हैं। यह उपन्यास बार-बार ये सवाल करता है कि रिश्ते बचाने की कोशिश में इंसान खुद को कितना खो सकता है और किस मोड़ पर अपने लिए खड़ा होना जरूरी हो जाता है। लेकिन सही समय पर खराब रिश्ते से बाहर निकल जाना और अकेले हो जाना बेहतर ही होता है।‘बेहया’ आत्मसम्मान, रिश्तों, सामाजिक सोच और स्त्री की स्वतंत्र पहचान की जद्दोजहद में खुद को खोजता हुआ एक संवेदनशील उपन्यास है।  इसकी कहानी खत्म होने के बाद भी कुछ जरूरी सवाल अपने साथ ले जाने के लिए मजबूर करती है।



कलम क्या-क्या लिखाए

रिश्तों की जकड़न से खुद को खोने से बचाने की कहानी है : बेहया | किताबें & सिनेमा

  विनीता अस्थाना का उपन्यास ‘बेहया’ स्त्री की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को लेकर समाज से कई पेचीदा और जरूरी सवाल करता है। एक स्त्री की निजी जि...