एक इन्सानी त्रासदी की कहानी जो खत्म होने के बाद भी भीतर चलती रहती है : चींटी की अर्थी | किताबें & सिनेमा

कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो किताब के आखिरी पन्ने के साथ समाप्त तो हो जाती हैं लेकिन पाठक के मन में वे बहुत देर तक भीतर कहीं चलती रहती हैं। कौशलेन्द्र यादव का उपन्यास ‘चींटी की अर्थी’ इसी तरह की रचना है, जो प्रेम की कहानी कहते-कहते समाज की गहरी और कड़वी सच्चाइयों से रूबरू कराता है। यह कहानी इंसानी त्रासदी की है जिसका अंत हिंदी फिल्मों की तरह सुखद नहीं होता।

कहानी इलाहाबाद की ज़मीन पर पनपती है।विनोद, प्रिया, शाहिद और अन्य पात्रों के माध्यम से लेखक ने ऐसी दुनिया बनाई है, जहाँ रिश्ते केवल दो लोगों के बीच नहीं रहते, बल्कि परिवार, प्रतिष्ठा, सामाजिक सोच और लोगों की धारणाएँ भी उनके फैसलों को ज़मीदोज़ कर देती हैं। यही वजह है कि कहानी के साथ आगे बढ़ते हुए हम कभी विनोद के पक्ष तो कभी प्रिया की उलझनों को महसूस करते हैं। और कभी शाहिद के प्रति सहज सहानुभूति पैदा होती है।

इस उपन्यास को केवल प्रेम-कथा कहना इसके साथ न्याय नहीं होगा। कहानी में प्रेम जरूर है, लेकिन उसके पीछे सामाजिक रूढ़ियाँ, अफवाहें, पारिवारिक प्रतिष्ठा और ऑनर किलिंग जैसी क्रूर मानसिकता का बड़ा सवाल मौजूद है। लेखक यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि जब किसी अफवाह को सच मान लिया जाता है और सामाजिक प्रतिष्ठा इंसानी जिंदगी से बड़ी समझी जाने लगती है, तब पैदा होने वाली त्रासदी भयावह होती है जिसका जिम्मेदार कोई नहीं होता। आज के समय में समाज द्वारा फैलाई गई अफवाहें किसी की जिंदगी बर्बाद करने के लिए काफी हैं।

उपन्यास की खूबी यह है कि लेखक इन सवालों के जवाब देने के बजाय पाठक को स्वयं सोचने की जगह देता है। कहानी का सस्पेंस और घटनाओं का क्रम पाठक की दिलचस्पी बनाए रखता है। कहानी मानो वेब सीरीज के पार्ट्स जैसी आगे बढ़ती है और आगे क्या होने वाला है ये जानने की उत्सुकता बनी रहती है। 

‘चींटी की अर्थी’ का सबसे प्रभावशाली पक्ष इसका सामाजिक सरोकार है। लेखक ने कहानी के साथ जो अपने विचार रखे हैं वे आम इंसान को झकझोर देते हैं। प्रेम, प्रतिष्ठा और सामाजिक दबाव के बीच पिसते इंसान की कहानी के माध्यम से यह रचना हमें अपने आसपास के समाज को नए नजरिए से देखने का अवसर देती है। दुख की पराकाष्ठा का जो मंजर लेखक ने पेश किया है वो निशब्द कर देने वाला है, इतना संवदेनशील कि आँखों में आंसू आ जाए। किताब के पात्र और उनके संघर्ष स्मृति में रह जाते हैं और कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब किताब बंद करने के बाद भी पाठक अपने भीतर खोजता रहता है। अरे विनोद का क्या हुआ...।

कौशलेन्द्र यादव के इस संवेदनशील उपन्यास की कहानी ना जाने कितने लोगों की कहानी है। अगर आप ऐसी कहानी पढ़ना चाहते हैं जिसमें प्रेम के साथ सामाजिक संघर्ष हो, भावनात्मक गहराई हो और कहानी खत्म होने के बाद भी कुछ सवाल आपके साथ बने रहें तो ‘चींटी की अर्थी’ आपके लिए ही बनी है।

किताब : चींटी की अर्थी
लेखक : कौशलेन्द्र 
प्रकाशक : पंक्ति प्रकाशन






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