प्रिय निखिल !
तुम्हारी किताब का इंतजार मैंने वैसे ही किया जैसी मैंने अपनी पहली किताब का किया था। हॉस्टल की यादें सच में भावुक कर देती हैं और उन्हीं यादों में खो जाने का एक जरिया तुम्हारी किताब है। इसे मैंने वर्ल्ड फाइल से निकलकर एक किताब बनने तक देखा है और कितनी बार इसे पढ़ा। सच बताऊँ तो जिस सफर से आप खुद आए हो उस सफर के किस्से और सबक आपको सिर्फ भावुक करते हैं बोरियत नहीं देते। तुम्हारी पुस्तक हॉस्टल के दिनों की वो यादें हैं जो आज भी कितने ही समझदार होने के बाद भी एक चेहरे पर हँसी दे जाती है। मुझे खुशी है कि मैं इस किताब का हिस्सा रहा। किताब को पढ़ते-पढ़ते ऐसा लग रहा था जैसे मैं अभी भी हॉस्टल में ही हूँ और सारे किस्से मेरे सामने टीवी में चल रहे हों।
खूबसूरत यादों का ऐसा सफर जब हॉस्टल बन जाता है दूसरा घर : ज़िन्दगी जंक्शन
अपने गाँव और घर की बेफ़िक्र दुनिया से निकलकर हॉस्टल की अनजानी दुनिया में कदम रखना केवल जगह बदलना नहीं होता, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। युवा लेखक निखिल जैन का पहला उपन्यास 'ज़िंदगी जंक्शन' इसी हॉस्टल, दोस्ती और जिम्मेदारी की संवेदनशील कहानी है। उपन्यास का मुख्य पात्र विवान अपने घर और गाँव को छोड़कर हॉस्टल पहुँचता है। शुरुआत में सब कुछ नया, अनजान और चुनौतीपूर्ण लगता है, लेकिन धीरे-धीरे वही हॉस्टल उसका दूसरा घर बन जाता है। विवान और उसके दोस्तों के बीच बनने वाले रिश्ते, उनकी शरारतें, संघर्ष, सपने और बिछड़ने का दर्द कहानी को जीवंत बना देते हैं।
निखिल की बेहद सरल, सहज और संवेदनशील भाषा पाठक को कहानी के पात्रों से आसानी से जोड़ देती है। यह उपन्यास पाठक को उन हॉस्टल के कमरों तक ले जाता है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने को मिलता है। घर से दूर रहने वाला एक छात्र छोटी-छोटी जिम्मेदारियों से आत्मनिर्भर बनना सीखता है। अपने कपड़े संभालने से लेकर समय का प्रबंधन करने तक, हर अनुभव उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है। यही छोटे-छोटे संघर्ष आगे चलकर जीवन की बड़ी सीख बन जाते हैं। कहानी कहीं आपको हँसाती है, कहीं भावुक करती है और अंत तक पहुँचते-पहुँचते जिम्मेदारियों का एहसास भी कराती है।
जब कोई व्यक्ति अपना घर छोड़कर हॉस्टल जाता है तो वह केवल चार दीवारें नहीं छोड़ता, बल्कि अपने गाँव की गलियाँ, बचपन के दोस्त, आँगन, सुबह-शाम की यादें और अनगिनत भावनाएँ भी पीछे छोड़कर आगे बढ़ता है। जीवन के हर मोड़ पर लिए गए निर्णय हमें नई मंजिलों तक पहुँचाते हैं, लेकिन कुछ यादें हमेशा हमारे साथ चलती रहती हैं। आखिर में 'ज़िंदगी जंक्शन' किताब अपने नाम के मुताबिक बताती है कि जीवन वास्तव में एक जंक्शन की तरह है, जहाँ अलग-अलग मंजिलों की तमाम ट्रेनें आती हैं। हर पड़ाव हमें कुछ नया सिखाकर आगे बढ़ जाता है और पीछे छोड़ जाता है यादों का एक खूबसूरत सफर जो बस चेहरे पर मुस्कान और आँखों को नम कर जाता है।
यदि आप कभी घर से दूर हॉस्टल में रहे हैं, तो यह उपन्यास आपको अपनी पुरानी यादों से फिर रूबरू करा देगा। और यदि आपने कभी हॉस्टल का जीवन नहीं जिया, तब भी यह किताब आपको उस दुनिया का ऐसा अनुभव कराएगी मानो आप स्वयं उन कमरों, गलियारों और दोस्तों के बीच मौजूद हों। अगर आप भी स्मृति पटल पर निर्जीव पड़ी यादों का फिर से स्वाद लेना चाहते हैं तो इस किताब का डोज़ जरूर लीजिए।


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