गाँव, कॉलेज और सपनों के बीच झूलती एक बेहतरीन कहानी : कभी गाँव कभी कॉलज ज़िन्दगी जंक्शन | किताबें & सिनेमा

 


कुछ किताबें केवल कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि एक पूरे जीवंत परिवेश को पाठकों के समक्ष रख देती हैं। अगम जैन का पहला उपन्यास "कभी गाँव, कभी कॉलेज" भी ऐसी ही रचना है, जो गाँव और कॉलेज के बीच पसरी उस दुनिया को जीवंत करती है जहाँ सपने हैं, संघर्ष हैं, प्रेम है, दोस्ती है, असफलताएँ हैं और उम्मीदें भी हैं। उपन्यास की बात करें तो कहानी एक ऐसे गाँव से शुरू होती है जहाँ नया कॉलेज खुला है। शिक्षा का मंदिर बनने के बजाय वह धीरे-धीरे व्यापार का केंद्र बनता दिखाई देता है। डीन साहब और चिलोंटाजी जैसे पात्र शिक्षा के व्यवसायीकरण पर तीखा व्यंग्य करते हैं। यह केवल विवेक, विनय, सुलोचन, चैन सिंह, सुरभि, महिमा, सुनील, राकेश, और चेतक भैया जैसे युवाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे सामाजिक ताने-बाने की कहानी है जहाँ शिक्षा, व्यवस्था और समाज एक-दूसरे से टकराते भी हैं और एक-दूसरे को साथ-साथ भी चलते हैं। कहीं-कहीं ऐसा लगता है जैसे मानो लेखक किसी दूर खड़े दर्शक की तरह नहीं, बल्कि उन्हीं गलियों, उन्हीं खेतों और उसी कॉलेज के बरामदों का हिस्सा रहे हों।

लेखक ने व्यंग्य को अपना सबसे प्रभावी हथियार बनाया है। उपन्यास पढ़ते हुए किताब के कई प्रसंग पाठकों को खुलकर हँसाते हैं। जैसे "मास्साहब" की परिभाषा, "भैया" कहने पर सविनय आंदोलन, "मुँहबोली पत्नी" जैसे प्रसंग कहानी को क्लिष्ट नहीं होने देते और इसी का सहारा लेकर लेखक समाज की गंभीर विसंगतियों पर गहरी चोट भी करता है। भाषा सरल और प्रवाहपूर्ण है, जो पाठक को कहानी से भटकने नहीं देती। विवेक जैसे संघर्षशील युवा के जीवन में सुरभि जैसी समझदार और पढ़ाकू दोस्त उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरती है। उनकी मित्रता प्रेम से अधिक प्रेरणा बनकर उभरती है। जहाँ उपन्यास शुरू होते ही सोच रहे थे कि विवेक और महिमा इसके नायक हो सकते हैं लेकिन खत्म होते-होते ये कहानी सुरभि और विवेक में समा गई। वही बात कि अंत में वो दो लोग मिलते हैं जो एक दूसरे को ढूँढ भी नहीं रहे होते हैं।

दूसरी ओर विनय का साहित्य के प्रति प्रेम और अपना विद्यालय खोलने का सपना यह दर्शाता है कि हर युवा का लक्ष्य केवल प्रशासनिक सेवा नहीं होता। कोई लेखक बनना चाहता है, कोई शिक्षक, कोई गाँव का सरपंच। सुलोचन का प्रेम और उसका संघर्ष, चैन सिंह का आलस्य और हास्य, महिमा का कॉलेज जीवन, सुनील की आवारागर्दी, राकेश की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ये सभी पात्र कहानी में रंग भरते हैं। कहानी में शिक्षा के व्यवसायीकरण, ग्रामीण युवाओं की सीमित संभावनाओं, प्रतिभाशाली छात्रों की मजबूरियों, प्रशासनिक उदासीनता और समाज में फैले दिखावे पर भी तीखा प्रहार करता है। 

"कभी गाँव कभी कॉलेज" एक ऐसा उपन्यास है जो आपको हँसाता भी है, सोचने पर मजबूर भी करता है और अपने कॉलेज के दिनों तथा गाँव की सोंधी सी यादों में भी ले जाता है। यदि आप ऐसे उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं जिनमें हास्य, व्यंग्य, संवेदना, प्रेम, दोस्ती और ग्रामीण जीवन सब समा गए हों तो यह पुस्तक निश्चित रूप से आपकी पढ़ने की सूची में शामिल होनी चाहिए।


किताब : कभी गाँव कभी कॉलेज 

लेखक: अगम जैन (IPS)

प्रकाशन: हिंद युग्म




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