प्रेम, सपनों और संघर्ष की दास्तान है 'कलेक्टर साहिबा' |किताबें & सिनेमा

कैलाश मांजू बिश्नोई की कलेक्टर साहिबा सीरीज की दोनों किताबें सिविल सेवा की तैयारी, प्रेम, महत्वाकांक्षा, संघर्ष और जीवन के कठिन निर्णयों को एक साथ पिरोने का प्रयास करती है। व्यक्ति की परिस्थिति बदलते ही प्रेम का यूं हुआ अंत आपको झकझोर देता है। कहानी का केंद्र गिरीश और एंजेल दोनों के सपने बड़े हैं और मंजिल भी लगभग एक ही—सिविल सर्विसेज। लेकिन जीवन हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलता। एंजेल अपने लक्ष्य को हासिल कर IAS अधिकारी बन जाती है, जबकि गिरीश का सफर कहीं अधिक संघर्षपूर्ण हो जाता है। बस यहीं से कहानी केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की कहानी न रहकर प्रेम, महत्वाकांक्षा और परिस्थितियों के बीच फँसे दो व्यक्तियों की कहानी बन जाती है।

पहले भाग में लेखक ने सिविल सेवा की तैयारी की दुनिया को करीब से दिखाने का प्रयास किया है। तैयारी के दौरान आने वाली मुश्किलें और अभ्यर्थियों के मन में चलने वाली उथल-पुथल जैसे प्रसंग पुस्तक को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से जोड़ते हैं। बीच-बीच में दिए गए सुझाव और प्रेरणात्मक विचार भी उपयोगी हैं। पहले भाग में आपको कहानी कम मोटिवेशन का डोज ज्यादा मिलता है। जिससे लेखक की कोशिश यही है कि वह केवल कहानी सुनाना नहीं चाहते, बल्कि अपने पाठकों, खासकर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे युवाओं को सकारात्मक संदेश भी देना चाहते हैं।

दूसरे भाग में कहानी बहुत इमोशनल हो जाती है। गिरीश और एंजेल के रिश्ते में आए बदलाव, दूरी, प्रेम, पीड़ा और अधूरेपन को लेखक ने बयाँ किया है। गिरीश के पत्र और उसके मन की भावनाओं का चित्रण इस भाग के संवेदनशील हिस्सों में शामिल है। एंजेल एक ओर उसका करियर और उसकी एंबीशन हैं, दूसरी ओर परिवार, सामाजिक परिस्थितियाँ और निजी रिश्ते। दोनों पुस्तकों में प्रेम के साथ-साथ आत्मसम्मान का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। गिरीश के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपने दर्द को केवल कमजोरी नहीं बनने देता। परिस्थितियाँ उसे तोड़ती हैं, लेकिन वही परिस्थितियाँ उसे अपने जीवन को नए तरीके से देखने की ताकत भी देती हैं। प्रेम में असफलता को अंत मानने के बजाय आत्मनिर्माण में बदलने का यह संदेश पुस्तक का सकारात्मक पक्ष है।

लेखक की भाषा सहज और संवादात्मक है। कई स्थानों पर संवाद, पत्र और भावनात्मक प्रसंग पाठक को कहानी से जोड़ते हैं। शायद इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात इसका अधूरापन है। हर प्रेम कहानी का सुखद अंत हो, यह जरूरी नहीं। कुछ रिश्ते मंजिल तक नहीं पहुँचते, लेकिन वे व्यक्ति को बदल जरूर देते हैं। गिरीश और एंजेल की कहानी भी इसी भाव को सामने लाती है। कभी-कभी किसी को पाना प्रेम नहीं होता, बल्कि उसके साथ बिताया समय, उससे मिली सीख और उसके बाद स्वयं को संभाल लेना भी प्रेम की एक अलग परिभाषा हो सकती है।

बहरहाल कलेक्टर साहिबा के दोनों भाग प्रेम, सपनों, संघर्ष, महत्वाकांक्षा और आत्मसम्मान की एक ऐसी यात्रा प्रस्तुत करते हैं जिसमें पाठक को जीवन में सही निर्णय लेने का जज़्बा पैदा होता है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से रुचिकर हो सकती है जिन्हें प्रेमकथाओं के साथ प्रेरणा और जीवन से जुड़े सबक भी समेटना पसंद हैं। यह सिर्फ कलेक्टर बनने की कहानी नहीं, बल्कि सपनों के बीच जन्मे प्रेम, प्रेम में मिले दर्द और उस दर्द से खुद को फिर खड़ा करने की कहानी है।


पुस्तक: कलेक्टर साहिबा पार्ट 1-2
लेखक: कैलाश मांजू बिश्नोई
प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस

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