सपनों की लंबी उड़ान भरने के बाद अपनी जड़ों की ओर वापिस लौटने की कहानी है : मैं अब भी वहीं हूँ |किताबें&सिनेमा

हमारी जिंदगी में कुछ ऐसे पड़ाव आते हैं, जिन्हें पीछे छोड़कर हम आगे तो निकल जाते हैं लेकिन उनसे पूरी तरह अलग नहीं हो पाते। अपना गाँव, घर का आँगन, दोस्तों के साथ बिताया वक्त, किसी अपने की कही हुई बातें या अधूरा रह गया कोई सपना ये सब समय के साथ हमारी यादों का हिस्सा बन जाते हैं। पंकज जीना का उपन्यास ‘मैं अब भी वहीं हूँ’ इन्हीं यादों और उनसे जुड़े भावनात्मक जुड़ाव को शब्द देता है।

कहानी पढ़ते हुए महसूस होता है कि लेखक उस पीढ़ी की कहानी कह रहे हैं जिसने छोटे शहरों और अपने परिचित माहौल से निकलकर बड़े शहरों में अपने लिए जगह बनाने की कोशिश की है। सपनों को पूरा करने की चाह में घर से दूर जाना, नई जगह पर खुद को स्थापित करना, नए दोस्त बनाना और इस पूरे सफर में अपने पुराने जीवन को भीतर संजोए रखना बहुत मुश्किल है।
पंकज जीना की लेखन शैली सहज है। भाषा कहीं भी पाठक पर अपनी साहित्यिक गंभीरता थोपने की कोशिश नहीं करती। घटनाएँ सामान्य जीवन से उठाई हुई लगती हैं और यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है जिससे लोग खुद को कहानी से कनेक्ट कर लेते हैं।

उपन्यास में कॉरपोरेट जगत की झलक भी देखने को मिलती है। नौकरी की भागदौड़, काम का तनाव, बॉस का दबाव, अकेले कमरे में गुजारते दिन और परिवार से अपनी परेशानियां छिपाकर उन्हें आश्वस्त करते रहना कि सब अच्छा चल रहा है, ऐसे कई अनुभवों को लेखक ने जिस तरह कहानी का हिस्सा बनाया है, वह आज के युवा जीवन की सच्चाई को सामने रखता है। रेडियो की दुनिया का चित्रण किताब को एक अलग आयाम देता है और पाठक को उस संसार के करीब ले जाता है।

कहानी में प्रेम भी मौजूद है लेकिन यहाँ प्रेम के साथ इंतजार है, दूरी है, अधूरेपन की कसक है और रिश्तों को बचाए रखने की कोशिश भी है। परिवार और दोस्ती के प्रसंग कहानी को भावुक बना देते हैं। पुरानी जगहों और बीते हुए समय की यादें आपको अपने दौर की याद दिला देती हैं। इस किताब की एक खास बात यह है कि इंसान परिस्थितियों के साथ बदलता जरूर है, लेकिन उसकी जड़ें अक्सर उसी जगह बनी रहती हैं जहाँ उसने पहली बार सपने देखे थे। मुखर का वापिस अपनी जड़ों में वापिस लौटना बताता है कि सपनों के साथ-साथ अपने भी बहुत जरूरी हैं। 

‘मैं अब भी वहीं हूँ’ आत्मकथात्मक अपने ज़मीनी जुड़ाव के कारण और भी विश्वसनीय है। कई इंसीडेंट इतने स्वाभाविक लगते हैं कि पाठक को लगता है जैसे वह किसी लेखक की कहानी नहीं, बल्कि खुद अपनी जिंदगी के पन्ने पढ़ रहा हो। अगर आप ऐसी कहानी में खोना चाहते हैं जिसमें काल्पनिक दुनिया ना दिखाकर जिंदगी के छोटे अनुभव, रिश्तों की गर्माहट, बनारस, बीते समय की कसक और अपनेपन का एहसास महत्वपूर्ण हो, तो यह उपन्यास आपको पसंद आयेगा। किताब खत्म होने के बाद आप सोचेंगे कि शायद हम सभी के भीतर सचमुच कोई न कोई हिस्सा आज भी वहीं है, जहाँ से हमारी कहानी शुरू हुई थी।

किताब : मैं अब भी वहीं हूँ
लेखक : पंकज जीना
प्रकाशक : ख्याति प्रकाशन


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